अमरत्व के उपहार - डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
अमरत्व के
उपहार
सत्य
विद्या के अतुल
भण्डार हैं ।
वेद मानव
जाति पर
उपकार है ।
कह रहे
तम छोड़ थामो
रौशनी । मित्रता अच्छी, न
अच्छी दुश्मनी ।
व्यक्ति
अच्छा है जो बातों
का धनी । वेद की हर
पंक्ति अमृत से सनी ।
ये अतनु
के देहधर उद्गार
हैं ।
मृत्यु को
अमरत्व के उपहार
हैं ।
हर पराई
पीर अपनी जान लो ।
गिर रहे को
मीत का अनुमान
लो ।
अश्रु
को मोती अगर तुम मान लो । स्वर्ग सी हँस
दे धरा प्रण ठान लो ।
भ्रष्ट बातों
के सबल इन्कार
हैं ।
सत्य
सम्यक्
के अटल स्वीकार हैं ।
सूत्र में
सारे पिरोये राज़
हैं । वेद धरती
के अनूठे साज़
हैं ।
वेद थे कल,
कल भी होंगे,आज हैं । वेद हर इक मूक
की आवाज़ हैं ।
जला दें
पाखण्ड ये अंगार
हैं ।
हँसा दें
मरुथल अमिय- रसधार हैं ।
वेद में
सारे समाये भेद
हैं । वेद सत संकल्प के
शुभ स्वेद हैं ।
कर रहे पाखण्ड
में नित छेद हैं । वेद
के सम वेद
केवल वेद हैं ।
वेद वीणा
की अमर झंकार
हैं ।
वेद धन्वा
की तरल टंकार
हैं ।
क्यों
दुखी हो वेद की आओ शरण । छूट जायेगा तुरत
जीवन मरण ।
खूब कर लो
शुद्ध अपना आचरण । यज्ञ कर लो
शुद्ध हो वातावरण ।
नित्य नूतन
दीखते हर बार
हैं ।
वेद ही
हर रोग का उपचार हैं ।
हैं ‘मनीषी’ गीत
केवल प्यार के । वेद शुभचिन्तक
सकल संसार के ।
वेद
में
हैं छन्द
बस उपकार के । वेद
माझी दुःख
पारावार के ।
घोर तमसा
में धवल उजियार
हैं ।
सत्य, सुन्दर,
शिवं के आधार
हैं ।
- डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
[ काव्य-संकलन 'आधा कफन' से ]

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