चक्कर पर चक्कर - डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
चक्कर पर चक्कर
चक्कर पर चक्कर
लख मेधा चकराई
है ।
प्रश्नों के उत्तर कब
प्रज्ञा दे
पाई है ।
झरनो की
कल कल कल पर्वत की प्राचीरें ।
मलयानिल
आकर नित बहती
धीरे-धीरे ।
सागर
से मिलने को
सरिता यों जाती है ।
प्रियतम
से मिलने को गोरी ज्यों
आती है ।
निश्छल सा
अर्पण है, सतरंगा
दर्पण है –
किसने कोकिल –स्वर में भर दी
शहनाई है ?
कोई सच्चाई
है या सपना
देखा है ।
गैरों में
भी मैंने इक
अपना देखा है ।
अनुभव करने
की है कहने की चीज नहीं ।
वृक्षों
से पहले या
बाद बना बीज कहीं ।
योगी जब डूब
गया कुछ बूंदें
ले आया ।
अज्ञानीपन
पर यह प्रकृति
मुस्काई है ।
चंदा
में तारों की
जगमग सी दीवाली ।
रजनी
पूजा करने निकली
लेकर थाली ।
चंदा
दूल्हा लगता तारों
की बारातें ।
चांदी
सी रातें हैं
सोने सी हैं
प्रातें ।
बादल में बिजली
है, फूलों पर तितली है ।
किसने झींगुर –पग में
पायल पहनाई है ?
किसने बिन होली
ही चोली रँग डाली है ।
पूरे
ही सागर में
किसने भँग डाली
है ।
पेड़ों
पर मस्ती है,
हँसती हर बस्ती
है ।
कोई
दूकान नहीं, कौड़ी
से सस्ती है ।
कुटिया में रहती
वो महलों में
जाती है –
पूरब में दुलहन
सी ऊषा शरमाई
है ।
पावन ये
गंगा है औ’
कंचन जंगा है ।
मानो या मत
मानो लेकिन सच नंगा है ।
पावक में जलता है, मारुत में
बहता है ।
जर्रे –
जर्रे में है
हर कोई कहता
है ।
पास नहीं आता
है, दूर नहीं
जाता है ।
कहता हूँ मैं
अपना पर वो
हरजाई है ।
सागर की
गहराई, अम्बर की
ऊँचाई ।
कितनी है
ऊँचाई, कितनी है
गहराई ।
बोलो किस
पैमाने से किसने
नापा है ।
नेति- नेति
सब कहते
इतना ही भांपा है ।
रंगों का मेला
है, खुशबू का
रेला है ।
खेतों में ये
किसकी चूनर लहराई
है ?
अम्बर में ये कैसी
बजती इक पायल है ।
आंसू टपकाकर
ही रोता
दिल घायल है ।
गर्जन से लगता
है बकता इक पागल है ।
पीड़ा का
पाहुन ही मस्ताना
बादल है ।
है ये बरसात
नहीं शंकर से
झगड़ा है ।
गौरी ने रिसियाकर
गागर छलकाई है ।
जिसने भी
ढूंढा है उसने
ही पाया है ।
वेदों में
वर्णित है गीता
ने गाया है ।
जाने क्यों कंकर
को शिव शंकर माना है ।
घाटों में
ढूंढा है फिर भी
अनजाना है ।
मन में ही रहता
है,‘मोहन’ यह कहता है ।
किंचित है झूठ नहीं बिलकुल सच्चाई है ।
अर्थ क्यों झगड़ते हैं शब्द के
कहारों से ।
पतझड़ ने माफी
क्यों
माँग ली बहारों से ।
चित्र है विचित्र किन्तु चित्रकार खोया है ।
दूर है
‘मनीषी’ घर राही क्यों सोया
है ।
बिन माचिस लकड़ी के, लाल सी
अंगीठी ये –
अम्बर के आंगन
में किसने सुलगाई
है ?
- डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
[ काव्य-संकलन 'आधा कफन' से ]

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