यज्ञ कवच है - डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
यज्ञ कवच
है
मन का अश्व सँभाल लाल नित यज्ञ
करो ।
ऋषियों का आदेश
पाल नित यज्ञ
करो ।
यज्ञ ज़िन्दगी
को जीने के
योग्य बना देता
है ।
सब उपकरणों
को अपने उपभोग्य बना
देता है ।
दान
देवपूजा संगतीकरण है
मर्म यज्ञ का ।
सबको सबका भाग
मिले यह ही है
धर्म यज्ञ का ।
हँस- हँस समिधा
डाल-डाल नित यज्ञ
करो ।
ऋषियों का आदेश
पाल नित यज्ञ
करो ।
अग्निदेव के मुख
में जो कुछ
भी पदार्थ जाता
है ।
भेदभाव के बिना
हर इक प्राणी
उसको पाता है ।
वातावरण सुगन्धित होता
मन प्रसन्न होता
है ।
हँसते हैं पर्जन्य
धरा पर खूब
अन्न होता है ।
वसुधा हो खुश - हाल - हाल नित
यज्ञ करो ।
ऋषियों का आदेश पाल
नित यज्ञ करो ।
यज्ञ कवच है सदा
पाप आक्रमण विफल
करता है ।
यज्ञ देव संकल्प
हृदय का सदा
सफल करता है ।
मन के मानसरोवर
का तल जल
निर्मल होता है ।
यज्ञ करो
तो हर इक आंसू
गंगाजल होता है ।
लौट जाय कंकाल
काल नित यज्ञ
करो ।
ऋषियों का आदेश
पाल नित यज्ञ
करो ।
बुद्धि विधायक शान्ति प्रदायक गायक नायक शुभ का ।
मेधा प्रज्ञा पोषक
नाशक दुर्मति और
अशुभ का ।
है सन्निहित कल्पना
इसमें सौ समाजवादों
की ।
जलती हैं होलिका
इसी में सारे
अवसादों की ।
कभी नियम मत
टाल - टाल नित यज्ञ
करो ।
ऋषियों का आदेश
पाल नित यज्ञ
करो ।
सभी धर्म प्रेमी
लोगों से मुझे
यही कहना है ।
यज्ञ करे यदि
देश प्रदूषण जरा
नहीं रहना है ।
हों प्रसन्न भगवान
यहाँ पर निच्छल
एक यज्ञ से ।
हर इक
समस्या का निदान
है केवल एक यज्ञ
से ।
क्यों होते बेहाल
- हाल नित यज्ञ
करो ।
ऋषियों का आदेश
पाल नित यज्ञ
करो ।
यज्ञ किये कुत्सित
कुबुद्धि झट से
प्रबुद्ध होती है ।
मन का दर्पण
निर्मल हो आत्मा
शुद्ध होती है ।
मावस भी पूनम
बनती सिसकी सरगम होती
है ।
मरघट भी पनघट
होता फिर आंख न नम होती है ।
कटे जाल जंजाल - जाल नित
यज्ञ करो ।
ऋषियों का आदेश
पाल नित यज्ञ
करो ।
अणु अणु कण कण में क्षण क्षण नित यज्ञ हुआ करता है।
जर्रा जर्रा यजमानों
के लिए दुआ
करता है ।
सृष्टि ‘मनीषी’ बंधी
नियम से नित्य
यज्ञ करती है ।
दुनिया की
खाली झोली वरदानों
से भरती है ।
भरे हृदय का
ताल - ताल नित यज्ञ
करो ।
हल हों सभी
सवाल भाल नित
यज्ञ करो ।
- डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
[ काव्य-संकलन 'आधा कफन' से ]

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