सरस्वती वन्दना - डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
सरस्वती वन्दना
ऐसा दो वरदान शारदे
! पीर गज़ल हो जाए।
हर इक शूल कमल हो जाए।
नफरत के काँटे जल जायें
जीवन के कानन से।
रहूँ पोंछता सदा पसीना हर दुखिया आनन से।
देखूँ दुखी किसी को मेरी आँख
सजल हो जाए।
आँसू गंगाजल हो जाए।
हर लावारिस डोली के हित मैं
कहार बन जाऊँ।
पतझड़ के मेले में
घुसकर मैं बहार बन जाऊँ।
हर चिंतित हलधर को मेरा गीत
फसल हो जाए।
मेरा मन बादल हो
जाए।
अच्छे-अच्छे कामों खातिर मर
जाऊँ बिक जाऊँ।
सच्चाई के भवन के लिए
नींव बनूँ टिक जाऊँ।
मेरी कविता
घायल पाँवों की पायल
हो जाए।
सबकी राह सरल हो जाए।
चलता रहूँ सत्य के पथ पर कभी न रुकने पाऊँ।
निर्दय आदेशों के
आगे कभी न झुकने पाऊँ।
मेरी सांसें
सूने नयनों का
काजल हो जाए।
मेरा कवि पागल हो जाए।
हर घायल आँसू की खातिर नयन
बिछा दूँ अपने।
दीपक बन
जायें दीवाली सच हो जायें सपने।
धूप झुलसती जिनको, मेरा तन आँचल हो जाये।
सबकी आस सफल हो जाए।
कभी न टेकूँ मजबूरी के आगे अपना
माथा।
अपने गीतों में लिख डालूँ हर
पीड़ित की गाथा।
चोट किसी के लगे ‘मनीषी’ मन घायल हो जाए।
कुटिया ताजमहल हो जाए।
ऐसा दो वरदान शारदे !पीर ग़जल हो जाए।
हर इक शूल कमल हो जाए।
- डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
- डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
[ काव्य-संकलन 'आग के अक्षर' से ]

Comments
Post a Comment