नहीं चाहिए चिमनियों का धुआं - डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’


                                                     नहीं  चाहिए  चिमनियों  का  धुआं
न  चांदी  न  सोना  रतन  चाहिए, न  कांटे  न  कलियाँ  चमन  चाहिए  ।
मुझे  और  कुछ  भी नहीं  मांगना ---प्रभो ! सिर्फ   तेरी  शरण  चाहिए  ।
सदा  सत्य  के  पथ   पे  चलत रहूँ । बचाने  मैं  औरों  को  जलता  रहूँ  ।
गिरूँ  गिरके  फिर-फि  सँभलता रहूँ । लिए  हाथ मरहम निकलता  रहूँ  ।
किसी  का   न   मुझको   नमन   चाहिए  ।
न  रेशम   का   मुझको   कफ़न   चाहिए  ।
लडूं    मैं   सदा  दुष्ट अन्याय   से  मुझे  न्याय - पथ  में  मरण  चाहिए ।
मुझे  और  कुछ  भी  नहीं  मांगना ---प्रभो ! सिर्फ  तेरी  शरण चाहिए  ।

किसी  के  अगर  काम  मैं  आ  सकूं । जहां  भेजना  है  वहां  ज सकूं ।
तुम्हारी  कृपा- दृष्टि  मैं पा सकूं । सफल  ज़िन्दगी  की ग़ज़ल  गा  सकूं ।
न  कलुषित   कपट   का   नयन  चाहिए ।
न  छल  का  कुटिल  सा  सृजन  चाहिए ।
पिता  झूठ  के  तीर   नित  बेधते---मुझे  सत्य  का  आवरण  चाहिए ।
मुझे और   कुछ   भी नहीं  मांगना---प्रभो !सिर्फ तेरी  शरण चाहिए  ।

सदा  प्यार  के  गीत  गाता  चलूं ।घृणा   को   हृदय  से  भगाता  चलूं  ।
जो  बिछुड़े  उन्हें  फिर मनाता   चलूं । सभी को  गले  से  लगाता चलूं ।
न  कागज़   के   मुझको   सुमन  चाहिए  ।
जला   दे,    न    ऐसी    तपन   चाहिए   ।
मुझे  और  कुछ   भी नहीं कामना ---पिता !तेरे पथ  का  वर  चाहिए ।
मुझे   और  कुछ  भी नहीं  मांगना---प्रभो !सिर्फ तेरी  शरण  चाहिए  ।
न मुझमें बनावट   का  व्यवहार  हो न  अपमान हो सिर्फ  सत्कार हो ।
कहीं  भी  लहू  का  न  व्यापा हो  ।सकल विश्व संयुक्त  परिवार   हो ।
न   उड़ने   को   मुझको   गगन   चाहिए ।
किसी   और  से    ना    मिलन   चाहिए ।
नहीं  चाहिए  चिमनियों  का धुआं ‘मनीषी’ को  संध्या हवन चाहिए ।
मुझे  और  कुछ भी नहीं  मांगना --- प्रभो !सिर्फ तेरी  शरण चाहिए ।
- डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
 [ काव्य-संकलन 'आधा कफन' से ]

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