जवानी - डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
जवानी
जवानी नाम संकट और
दुख में झूमने
का है।
इसी का काम
ही फाँसी के
फंदे चूमने का है।
जवानी है वही
जो पददलित का मान
करती है।
जवानी ऐश औ’ आराम का
अपमान करती है ।
जवानी
नाम है दुख-दर्द क्लेश
निदान करने का।
यही तो वक्त
है तूफान से
टकरा उभरने का ।
जवानी
है वही जो उर-तिमिर
का नाश
करती है।
जवानी है वही
जो सत्य -ज्ञान प्रकाश
भरती है।
जवानी को न
चिंता मान औ’ अपमान की
होती ।
जवानी में
लगी चिन्ता वतन
की शान की
होती।
अनाथों की
खुशी बनकर जवानी
झूम उठती है।
बनाकर जाम आँसू
को खुशी से
चूम उठती है।
अभावों की चिता
पर वृष्टि बनकर
टूट पड़ती है।
अमा के कुहर पर भी
नव किरण -सी फूट पड़ती है।
कभी हो
क्रोध में तो रक्त
से इतिहास लिखती है।
भयंकर आँधियों की
गोद में बन
आग दिपती है।
कभी जब शान्त होती
तो ‘मनीषी’
हास देती है।
असंख्यों पतझड़ों को
हर्ष का मधुमास
देती है ।
किसी की आँख के
आँसू हटाए वह जवानी
है ।
किसी के घाव पर
मरहम लगाये वह जवानी
है ।
दुखों के गरजते
सागर पे नाचे
वह जवानी है ।
पराई पीर
के पत्रों
को बाँचे वह
जवानी है ।
जवानी है
वही जो देश पर
मर-मर के जीती
है।
जवानी
है वही जो
दुःख के सागर
को पीती है।
जवानी
आग की लपटों में
बैठी खूब हँसती है।
जवानी
मृत्यु-दुलहन को सदा बाँहों
में कसती है।
जवानी जुल्म
के आगे सदा
सीना अड़ा देती।
जवानी बाज से
नन्ही-सी चिड़िया को लड़ा देती।
शहीदों के शिलालेखों
को हरदम याद
करती है।
कभी सय्याद के
आगे नहीं फरियाद
करती है।
जवानी
ज़िन्दगी का एक वह
अनमोल हिस्सा है।
सदा होठों पे जिसके क्रान्ति शोलों का ही किस्सा
है।
जवानी धूप है
सर्दी में औ’
गर्मी में छाया है।
जहाँ देखो वहीं मिलती
जवानी की ही माया है।
जवानी के
लिए चट्टान भी
हड्डी का चूरा
है।
जवानी के बिना
हर यज्ञ बौना
है अधूरा है।
जवानों ने ही
खींचा कान तक अपनी कमानों को।
तभी दुनिया में
भेजा ईश ने पहले
जवानों को।
सदा होठों पे रहती जो, जवानी वह कहानी
है।
जवानी नित नई
रहती नहीं पड़ती
पुरानी है ।
जवानी गान
है, तूफान
है,
बेजोड़ दानी है ।
जवानी आग है,
बिजली है,
आँधी और पानी है।
कभी मिटती नहीं
जग से जवानी
वह निशानी है।
अधिक मैं क्या
कहूँ भैया जवानी
तो जवानी है ।
जवानी चाल दरिया
की सतत गतिमान
होती है।
हृदय
की भूमि में
हरदम सुखों के बीज
बोती है।
जवानी जागरण
का नाम वह पल भर न
सोती है।
जवानी का
न सानी सृष्टि का
का वरदान होती है।
- डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
[ काव्य-संकलन 'आग के अक्षर' से ]

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