काव्य कामिनी भटक रही है - डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’

                  काव्य  कामिनी  भटक रही  है

काव्य–कामिनी क्यों पागल सी आज सड़क पर भटक रही है।
अम्बर से  गिरकर  खजूर में  क्यों  त्रिशंकु  सी अटक रही  है।
                     पहले  मन  की कुटिया  में  संवेदन-धूप भरा  करती  थी।
                     हृदयस्थिति  को   मुक्त बनाकर पूर्ण थकान हरा करती थी।
                     आज न जाने उसे हुआ क्या, मन को बोझिल कर देती है।
                     नव  दुलहन को कफ़न उढ़ाकर चिंता- दीपक  धर  देती है।
विष का  कुल्हड़  पकड़  हाथ  में रस-गागर  को  पटक रही है।
काव्य- कामिनी क्यों पागल सी  आज सड़क पर भटक रही है।
                      आकर्षण से रहित शुष्क केवल बौद्धिक व्यायाम बना है।
                      भावतत्व से  शून्य बुद्धि  का नीरस -निर्मम जाल तना है।
                      आज जिसे कविता कहते  हैं क्या वह  नीरस गद्य नहीं है?
                      कविता की  हत्या होती है यह भी बिलकुल बात सही है।
बाजारू  औरत   बनकर   कर  नए   इशारे   मटक   रही  है।
काव्य-कामिनी क्यों पागल सी आज सड़क पर भटक रही है।
                        है  नीरसता औ दुरूहता,यह पश्चिम की छिपी नकल है।
                        इतने भोले-भाले कवि हैं नहीं गाँठ की तनिक अकल है।
                        धरती  अपनी   बीज  पराया  है  अज्ञेय  पन्थ  राही का।
                        मठाधीश बन गये लोग कुछ, है युग झूठी वाहवाही का।
अनुशासन  की  बातें  दुनिया  नाक  चढ़ाकर  झटक   रही  है।
काव्य- कामिनी क्यों  पागल सी आज सड़क पर भटक रही है।
                  छोटी, लम्बी, चन्द   लकीरें  खड़ा  कर दिया  चिह्न कटघरा।
                  कविता को शुभचिन्तक गण ने बना दिया है बलि का बकरा।
                  वादों   की  खन्दक  खोदी  हैं,  खड़ी   हुई  गुट  की   दीवारें।
                   ऐरे-   गैरे -  नत्थू  - खैरे    बना  रहे   है    कविता-  मीनारें।
                                   
तालछन्द,  लय,  तुक औ ध्वनि भी फाँसी ऊपर लटक रही है।
काव्य- कामिनी   क्यों  पागल सी  आज सड़क  पर भटक रही है।
                       जब  खजूर  ने  छोड़ा  तो वह  औंधे मुंह धरती पर आई।
                        तुलसी   और  सूर  ने  देखा  तो  उनको  आ गई रुलाई।
                     अभिनय और स्वरों की बैसाखी पर जब कविता  लंगड़ाई।
                      स्वर्णिम युग धूमिल होने पर आँख ‘मनीषीकी भर आई।
बस    अभाव   पूरा   करने  को  मेरे   दिल  में   खटक   रही  है।

काव्य- कामिनी   क्यों  पागल सी  आज सड़क  पर भटक रही है।
- डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
 [ काव्य-संकलन 'आग के अक्षर' से ]

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