माँ भारती की शान हो - डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
माँ
भारती की शान
हो
चाँदी
नहीं सोना नहीं, रहने को
इक कोना नहीं ।
फिर भी कभी
रोना नहीं इन्सान
तुम इन्सान हो ।
माँ भारती की
शान हो ।
यह दुःख भी
क्या चीज है ।
इसमें सुखों का
बीज है ।
मधुमास पतझड़ में
छुपा ,
मरुथल में सावन
तीज है ।
निर्माण नवयुग
का करो, श्रम
शील तुम दिनमान
हो।
माँ भारती
की शान हो ।
दुख घूँट हँस – हँसकर
पिए।
इन्सानियत के हित
जिए ।
मरते रहे परमार्थ
हित,
रिसते हुए नस्तर
सिए ।
नस- नस
में वह ही
रक्त है ऋषियों
की तुम संतान
हो।
माँ भारती
की शान
हो ।
मत जुल्म
कर, यह भूल है।
काँटा नहीं
तू फूल है ।
दुख- दर्द
जगती के मिटा,
शिव का
तू तेज त्रिशूल
है।
शुभ कर्म का
इतिहास जी, दो दिन के
तुम मेहमान हो।
माँ
भारती की शान
हो ।
तन में अपरिमित
शक्ति है।
मन में असीमित भक्ति
है ।
अब पाठ लिख
दो प्रेम का,
सूनी पड़ी अनुरक्ति
है ।
नफरत
उड़े बन पात
सी, उठते हुए
तूफान हो ।
माँ
भारती की शान
हो ।
मौसम बड़ा ही
क्रूर है ।
कह दे
‘मनीषी’ शूर
है ।
पतवार हाथों
में उठा ,
मंजिल नहीं
कुछ दूर है ।
अन्याय
का तम दूर कर, तुम न्याय के
शशि, भान हो।
माँ भारती
की शान हो ।
- डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
[ काव्य-संकलन 'आग के अक्षर' से ]

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