अब यह देश कहाँ जायेगा - डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
अब
यह देश कहाँ
जायेगा
शर्म न है किंचित
आँखों
में।
शक्ति न शेष रही
पाँखों में ।
बाड़ खेत खा
रही यहाँ तो गेहूँ
कैसे मुस्कायेगा?
यही रहे आसार
यहाँ के तो यह
देश कहाँ जायेगा?
ऐसा
लगता माली ने फूलों
को तो फाँसी
दे दी है।
शूलों
को जागीर बख्श दी ,
कव्वों काशी दे
दी है।
बेटे
मौज उड़ाते पर माँ को
रोटी बासी दे
दी है।
अन्धे
दुखी बाप के
हाथों में सत्यानाशी दे
दी है।
भँवर कठिन
पतवार नहीं हैं।
अच्छे अब
आसार नहीं हैं।
व्याज बढ़ा
पीढ़ी- दर- पीढ़ी कैसे कर्ज
उतार पायेगा ?
यही हाल यदि
रहा यहाँ का तब यह देश कहाँ जायेगा?
बटमारों
को सन्त झूठ को
सत्य यहाँ माना
जाता है ।
जो जितना
शरीफ है उसको
उतना ही ताना
जाता है।
चेहरे
पर कितने चेहरे
हैं व्यक्ति न
पहचाना जाता है।
गद्दारों
को देश भक्त
की संज्ञा से
जाना जाता है ।
बदल गई
हैं परिभाषाएँ ।
झुलस रहीं क्वारी आशाएँ।
घिरा हुआ शोलों
में कब तक फूल अभागा
मुस्कायेगा?
यही हाल यदि
रहा यहाँ का तब यह देश कहाँ जायेगा?
गोरी दुलहन के चक्कर
में आकर माँ
को बेच रहे हैं।
बेटे हैं
बेशर्म बहुत माँ
की साड़ी को
खेंच रहे हैं।
बाप
घूरता है बेटी
को लुटने लगी
राह में राखी ।
मानवता लंगडाती
फिरती देगा कौन
उसे बैसाखी।
सब रिश्ते बीमार
हो गए।
घर भी अब
बाजार हो गए।
उठो बचा लो राष्ट्र ‘मनीषी’ अजगर देश निगल खायेगा।
यही हाल रहा यदि यहाँ का तब यह देश कहाँ जायेगा।
नहीं
जानना जीवन -दर्शन आज यहाँ
के नचिकेता को।
देख रहा
हूँ रोज बेचते
धर्म-शर्म हर विक्रेता
को ।
चुंबन – आलिंगन मदिरा मैथुन ही प्रिय
है अभिनेता को।
देश पड़े चूल्हे
में कुर्सी दीख
रही है हर
नेता को।
साँप
लगे अम्बर में
उड़ने।
लगा यहाँ
हर बाग उजड़ने।
कफ़न
शहीदों का बिकवा
कर कोई चैन नहीं पायेगा।
यही हाल
रहा यदि यहाँ का तब यह देश कहाँ जायेगा।
- डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
[ काव्य-संकलन 'आग के अक्षर' से ]

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