आल्हा फकीर हूँ मैं - डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
आल्हा
फकीर हूँ मैं
विश्वास
की हवा हूँ, हर रोग
की दवा हूँ ।
हर सेर को
सवा
हूँ ऐसा वजीर
हूँ मैं ।
बिछड़े हैं जो
युगों से उनको पुनः
मिलाता।
जिनका नहीं ‘मनीषी’ अपना उन्हें
बनाता ।
विध्वंस का सगा
हूँ निर्माण से है
नाता।
घर फूँक
खेल देखे उनको
गले लगता।
सबके जनम-
मरण में, हर
दीन की शरण में।
दुःशासनी
हरण में मोहन
का चीर हूँ
मैं ।
गीतों के आँगनों
में शब्दों से खेलता
हूँ।
हर व्यंग्य बाण
हँसकर सीने पे
झेलता हूँ।
लहरों पे नाचता
हूँ,
भँवरों में तैरता
हूँ ।
अतुकान्त हो न
जाये हर तुक नकेलता हूँ।
विद्रोह का मैं
कवि हूँ , हर झोंपड़ी का रवि हूँ।
पीड़ा की मूर्त्त छवि
हूँ ---प्यासे को नीर हूँ मैं।
संतुष्ट हूँ मैं
खुद से कुछ भी कहे
जमाना।
हर
बार पूछती है
पीड़ा मेरा ठिकाना।
धरती पे देह
मेरी, नभ पे है
आशियाना।
भावी प्रसिद्द
हूँ मैं लेकिन अभी
अजाना।
टूटे को जोड़ता
हूँ, आँसू बटोरता हूँ।
खुशियाँ बिखेरता जो--- ऐसा
अमीर हूँ मैं।
औरों के हौसलों
पर मैं तो नहीं
हूँ खेला।
दर्शक नहीं
हूँ केवल मैं तो स्वयं हूँ
मेला।
हर भीड़ में दिखा हूँ हरदम अलग अकेला।
गीतों का हूँ धनी
मैं यूँ पास
है न धेला।
सूरज पे छाँव
रखके, शहरों पे गाँव
रखके।
ताजों
पे पाँव रखके,
बढ़ता फकीर हूँ मैं।।
कविता
है एक सागर जिसका
नहीं किनारा।
यह है हृदय
का सौदा मिलता नहीं उधारा।
जीवन की झील का है बिन देह का शिकारा।
जो फँस गए हैं तम में उनके लिए
सितारा ।
पापी
पवित्र बनता, ऊँचा चरित्र
बनता।
जिससे
सुचित्र बनता---ऐसी लकीर हूँ मैं।
जो हैं लुटे
-पिटे से उनका नसीब
हूँ मैं।
जग दूर – दूर रहता
उनके करीब हूँ
मैं।
काँधे पे इस समय के घायल सलीब हूँ
मैं।
लगता बहुत हूँ
सीधा लेकिन अजीब हूँ मैं।
संघर्ष
की डगर में,
शब्दार्थ की उमर में।
अज्ञान के समर में --- कविता का तीर हूँ मैं।
- डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
[ काव्य-संकलन 'आग के अक्षर' से ]

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