आसाम नहीं होने देंगे - डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
आसाम
नहीं होने देंगे
राजनीति
की घोड़ी बिना
लगाम नहीं होने
देंगे।
पूरे भारत
को हर्गिज आसाम
नहीं होने देंगे ।
हमने माँ का
दूध पिया
है पानी नहीं
पिया है रे।
एक दिवस भी कायरता का जीवन नहीं
जिया है रे।
तार-तार
लावारिस आँचल हमने
सदा सिया है रे।
तपा -तपा जीवन को
हमने सूरज बना लिया है रे।
आँसू और लहू
को कातिल जाम
नहीं होने देंगे।
स्वार्थसिद्धि
के लिए कभी
संग्राम नहीं होने
देंगे ।
राग विदेशी अपने
होठों पर कुछ ठीक नहीं लगते।
लाख मन्त्र मारो
मुर्दे
कब्रों से कभी
नहीं जगते ।
रँगते रहे
रक्त से चूनर
उन जालिम रँगरेजों के ।
सपने लेना
छोड़ो औरंगजेबों के
चंगेजों के।
आजादी की दुलहन को
गुमनाम नहीं होने
देंगे ।
वीर
शहीदों की समाधि
बदनाम नहीं होने
देंगे ।
शब्द उधारे
लेने से इतिहास
नहीं बन पाता है।
बीच सिसकियों के शादी
का मण्डप कब तन पाता है।
डेढ़ चावलों की खिचड़ी को
अलग पकाना ठीक नहीं।
एक देश में अलग
देश की
माँग उठाना ठीक नहीं।
आँगन में
नफरत की दुआ- सलाम
नहीं होने देंगे ।
मन्दिर- मस्जिद
खातिर कत्ले आम नहीं होने
देंगे ।
आग के अक्षर / पृष्ठ २९
पागल दीपक तेल
न माँगे अपनी बुझती
बाती से ।
कोई बेटा
खून न माँगे
अपनी माँ की
छाती से।
हरी- भरी बगिया को तज
के खालिस्तान न मांगो तुम।
नन्दन वन को
छोड़ बावलो कब्रिस्तान न मांगो तुम।
स्वतंत्रता
के सूरज की
हम शाम नहीं
होने देंगे ।
सूरज को रातों
का कभी गुलाम
नहीं होने देंगे।
अगर जरुरत पड़ी देश
को शीश समर्पित
कर देंगे।
रणचंडी का
खप्पर अपने गर्म
लहू से भर
देंगे।
देशभक्ति की
प्रबल प्रथा की साँझ नहीं हो पायेगी।
पुत्र मरे
कुछ, भारत माता
बाँझ नहीं हो जायेगी।
संसद की खासियत
‘मनीषी’ आम
नहीं होने देंगे ।
भारत
की इज्जत को
हम नीलाम नहीं
होने देंगे ।
- डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
[ काव्य-संकलन 'आग के अक्षर' से ]

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