कविता जन्मा करती है - डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
कविता जन्मा करती
है
जब तेजी से
भावों की आँधी
चलती है।
आतुर
होकर पीड़ा मुँह
जोर मचलती है।
जब तन- मन
का हर रोम-रोम सिहरन से भर,
कंकर से शंकर
का अभाव पूरा
करने ।
व्याकुल
रोकर पागल सा
हँसता गाता है ।
अज्ञात खड़े प्रिय
को आवाज लगाता है ।
ऐसे में
ही तो कविता
जन्मा करती है।
ऐसे में ही
तो कविता जन्मा
करती है।
सब माँ की
प्रसव वेदना से
तो परिचित हैं ।
कवि भी
ऐसे ही पीड़ा
का शिकार होता ।
मूर्च्छना मचलती ही
रहती है प्राणों
में ।
उसका हर तार- तार
झंकृत
सितार होता।
जब दर्द अधिक
बढ़ता है कवि चिल्लाता
है।
अफ़सोस निकट कब
कोई उसके आता
है ।
ऐसे में
ही तो कविता जन्मा
करती है ।
ऐसे में ही
तो कविता जन्मा करती
है ।
जब
दुनिया सोती है
अपनी ही मस्ती में ।
कवि
माँ बनकर भावों
को रक्त पिलाता
है।
जिनकी
बस्ती देखते - देखते
उजड़ गई ,
उन गूँगे भावों
को वाणी दे
जाता है ।
प्यासी
आँखों को आँसू
की गंगा देकर ,
आँचल में
लेकर मोती सा
दुलराता है ।
ऐसे में ही
तो कविता
जन्मा करती है ।
ऐसे में
ही तो कविता जन्मा
करती है ।
दिल में छाया
होता जब गहरा
अंधकार।
नित नए- नए
भूचाल मचलते रहते
हैं ।
सपनों के ताजमहल
गलते- ढलते रहते ।
अंतर में नूतन
भाव बिछलते रहते हैं
।
तब प्राणों
में आवाज कहीं
से आती है।
मैं मरा जा
रहा और न
अब सह पाउँगा।
ऐसे में ही तो
कविता जन्मा करती है।
ऐसे में ही
तो कविता जन्मा करती
है ।
जब
माँगे प्यार ‘मनीषी’ नफ़रत मिलती
है।
दरवाजे से
कोई दुत्कारा जाता
है ।
‘काली’
आता ‘विद्या’
कपाट जड़ देती है।
‘तुलसी’ जब ‘रत्ना’ से
फटकारा जाता है।
सपने कच्चे
ही मिल जाते
हैं धूली में।
इच्छाओं को लटकाया
जाता सूली पे ।
ऐसे में
ही तो कविता
जन्मा करती है।
ऐसे में ही
तो कविता जन्मा करती
है ।
- डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
[ काव्य-संकलन 'आग के अक्षर' से ]

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