मंज़िल मिलकर रहेगी - डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
मंज़िल मिलकर
रहेगी
पथ स्वयं
अपना बनाओ।
कस कमर बढ़ते ही जाओ।
चल पड़े यदि
रह में मंज़िल
तुम्हे मिलकर रहेगी ।
हो भले ही
देर हर मुश्किल
मगर टलकर रहेगी ।
प्रेरणा
लेता जमाना उस
बहादुर वीर नर से
।
जान को रखकर
हथेली पर निकल
पड़ता जो घर से।
मुश्किलों
के पंख काटो।
हर पराया दर्द
बाँटो।
बन गए प्रह्लाद
तो दुख-होलिका जलकर
रहेगी ।
हो भले ही देर
हर मुश्किल मगर
टलकर रहेगी ।
राह में
जो साथ
छोड़े शुद्ध संगाती
नहीं है ।
बीच में कर
दे अँधेरा वह
सजग बाती नहीं
है।
शक्ति तेरे
हाथ में है।
और ईश्वर
साथ में है ।
अब
सफलता की किरण
नूतन बिछलकर ही
रहेगी।
हो
भले ही देर
हर मुश्किल मगर
टलकर रहेगी।
व्यक्ति
का गौरव नहीं
विध्वंस में , निर्माण
में है।
दीप
की शोभा ज्वलन
में ही,
नहीं निर्वाण में
है।
जलन में
त्यौहार कैसा?
कण्टकों से
प्यार कैसा?
आ गया सावन
कली हर हाल
में खिलकर रहेगी ।
हो भले ही
देर हर मुश्किल
मगर टलकर रहेगी ।
तुम
पुरानी लीक पर
चलते रहे तो
क्या बड़ा है ।
नव सृजन
के वास्ते सामान
सब हाज़िर पड़ा
है।
पूर्व का
सम्मान कर लो।
अब नया निर्माण
कर लो।
श्रम
करो यह भूमि
अब मोती उगलकर
ही रहेगी।
हो भले
ही देर हर मुश्किल
मगर टलकर रहेगी ।
रक्त
का प्यासा न
हो हैवान, फिर
इन्सान ही है ।
अश्रु
की परवाह कर
ले तो मनुज
भगवान ही है।
जिन्दगी उलझी
पहेली ।
सर्प
बन डसती अकेली।
शक्ति औ’
श्रद्धा मिले तो
फन कुचलकर ही
रहेगी।
हो भले ही देर
हर
मुश्किल मगर
टलकर रहेगी ।
कामना
दे छोड़ फल
की कर्म कर यह सार
गीता।
दानवों
की कैद में
भी रह सकी
है शुद्ध सीता ।
मन - ‘मनीषी’ बाँध तोड़ो।
कायरों का
साथ छोड़ो ।
दो हृदय के
तार जोड़ो ज्योति
जलकर ही रहेगी ।
हो भले ही
देर हर मुश्किल
मगर टलकर रहेगी
।
- डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
[ काव्य-संकलन 'आग के अक्षर' से ]

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