गैरों को वतन बेच दिया - डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
गैरों
को वतन बेच
दिया
जैसे इक शेख
ने बोतल को
नमन बेच दिया।
जैसे
जयचन्द ने गैरों
को वतन बेच
दिया।
तुमने
वादे तो किए
देश से इतने
ज्यादा ,
सात
जन्मों में भी पूरे न
उन्हें कर पाओ।
पहले ताकत से अधिक
बोझ उठाया क्यों था,
ब्याज भारी है बहुत कर्ज न तुम भर पाओ।
देख हालत
को तुम्हारी यों मुझे
लगता है ----
जैसे
विधवा ने शराफत
का चलन बेच दिया।
तुमने हर नैन को ख्वाबों का दिया
था झाँसा,
और हर राख
को चन्दन के सपन
बाँटे थे ।
तुमने अपने
को बहारों का बताया
वारिस,
बुझ रही
साँस को नंदन के
वचन बाँटे थे।
स्वप्न
सब भग्न हुए तब
से लगे है ऐसे ----
जैसे कान्हा
ने स्वयं अपना
वचन बेच दिया।
हमको मालूम न
था राम नहीं रावण
है ,
शान्ति -सीता को उड़ाने की सफल साजिश है।
सभ्य चेहरों की
नकाबों को पहनकर आये ,
सिर्फ
कुर्सी को हड़पने की ही इक कोशिश है।
चोट
विश्वास को पहुंचाई हैं तुमने ऐसे ----
जैसे माशूक ने आशिक का कफ़न बेच दिया।
पंख
तो काट दिए और खुला छोड़
दिया,
कितने चालाक शिकारी से
पड़ा पाला है ।
दूध धुले
दीख पड़े भूल
निगाहों से हुई ,
ये है वो नाग जो पहले से अधिक
काला है।
इनके आसार
मुझे लगते हैं बिलकुल ऐसे ---
जैसे
पूनम ने अमावस को
गगन बेच दिया।
आज
सिन्दूर सुरक्षित न
किसी का दीखे ,
कौन कब पौंछ
दे माथे की चमकती बिंदिया।
किसकी मुस्कान बदल जाय तुरत सिसकी में,
है
न मालूम उड़े
नैन से किसकी निंदिया।
भीड़
अपराध की देखूँ
हूँ तो लगता ऐसे ---
जैसे माली
ने पतझड़ों को चमन बेच दिया।
तुमने
सत्ता को बना छोड़ दिया है लंगड़ा,
शान्ति सडकों पे
पड़ी दी न उसे
बैसाखी।
लोग सम्बन्ध की पहचान
तलक भूल गए ,
कौन बाँधेगी
कलाई पे किसी
के राखी।
लोभ की आग जली
दिल में ‘मनीषी’ ऐसे ---
जैसे सूरज
ने अँधेरे को
बदन बेच दिया।
- डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
[ काव्य-संकलन 'आग के अक्षर' से ]

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