ज़िन्दगी - डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
ज़िन्दगी
खो चुकी
जुबान ज़िन्दगी।
बाँझ के समान
ज़िन्दगी ।
रोटी
की खातिर ऐसे
वह बदन बेच
देती है ।
जैसे
बेबस दुलहन अपना
सजन बेच देती
है।
दुश्चिन्ता
का बोझ अभागिन
ऐसे रोज उठाए।
जैसे
बिना छपे ही
कवि का महाकाव्य
खो जाए ।
कातिल
क्रूर समाज व्यंग्य
के तीखे तीर
चलाए ।
बूढ़ा
अन्धा बाप इसी
गम से पागल
हो जाए।
दर्द की
है खान ज़िन्दगी।
पींजरे में जान ज़िन्दगी
।
है कफ़न
का थान ज़िन्दगी।
जागता मसान
ज़िन्दगी।
रोटी
की खातिर ऐसे
वह बदन बेच
देती है ।
जैसे
विधवा माँ बेटे
का कफ़न बेच
देती है ।
हाथ काट दे
आँख फोड़ दे
फिर भी कुछ
ना बोले।
बैठी
है प्रह्लाद बनी
हर ओर भड़कते
शोले ।
मरुथल
में मछली सी
तड़पे जल को
ढूँढ रही है ।
वन -वन
भटके दमयन्ती सी नल को
ढूँढ रही है ।
एक बियाबान
ज़िन्दगी।
छिद्रयुक्त यान
ज़िन्दगी ।
खण्डहर दुकान
ज़िन्दगी।
जल रहा
मकान ज़िन्दगी।
रोटी
की खातिर ऐसे
वह बदन बेच
देती है ।
जैसे बुढ़िया
मालिन अपना चमन
बेच देती है ।
हाथों
में मेंहदी के
बदले क्रूर कठोर
लकीरें ।
रोम- रोम
में पड़ी हुई
हैं उलझन की
जंजीरें ।
ले ले कोई
पेट नोच ले
चाहे बोटी -बोटी ।
चीख -
चीखकर माँग रही
है दे दो
आधी रोटी ।
मौत का मचान ज़िन्दगी।
बेसुरी है तान ज़िन्दगी।
पर कटी
उड़ान ज़िन्दगी।
साँस पर लगान
ज़िन्दगी।
रोटी
की खातिर ऐसे
वह बदन बेच
देती है ।
जैसे
दुखी भिखारिन अपने
नयन बेच देती है
।
जुर्म
करे काटती सज़ा
हर बुरे कर्म
करती है ।
प्रतिभा श्वान,
गर्दभों के घर में
पानी भरती है
।
अपने
कन्धों पर अपनी
ही लाश लिए
चलती है ।
झूठ न किन्चित नित्य ‘मनीषी’
बिना आग जलती है।
कठिन इम्तिहान ज़िन्दगी।
गम की दास्तान
ज़िन्दगी ।
युद्ध घमासान ज़िन्दगी।
है लहूलुहान ज़िन्दगी ।
रोटी
की खातिर ऐसे
वह बदन बेच
देती है ।
जैसे
गीली आँख सुनहरे
सपन बेच देती
है ।
आँसू
आँखों के महलों की दरबानी
करते
हैं ।
मौसम
के मनचले सिपाही
मनमानी करते हैं ।
माँगे
मौत भाग्यहीना को
मौत नहीं आती
है ।
सच तो यह
है जीने की
लालसा नहीं जाती
है ।
आग के
अक्षर / पृष्ठ ११९
दूध का उफान
ज़िन्दगी ।
कर्जमय किसान ज़िन्दगी।
उम्र की थकान ज़िन्दगी।
तंग आसमान ज़िन्दगी।
रोटी
की खातिर ऐसे
वह बदन बेच
देती है ।
जैसे
एक पुजारिन पूजा हवन बेच
देती है ।
- डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
[ काव्य-संकलन 'आग के अक्षर' से ]

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