हिन्दी - डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
हिन्दी
भारत
माँ की झोली
में फिर भरना
है उल्लास हमें।
हिन्दी
की जय के
नारों से गुंजवाना आकाश
हमें ।
हिन्दी को
अपनायेंगे तो जग
हमको अपनायेगा।
भाषाई झगड़े समाप्त हों देश
स्वर्ग बन जायेगा।
भारत पुत्रो उठो ! न सोओ, सोने का यह वक्त नहीं।
वरना दुनिया कह देगी तुममें
ऋषियों का रक्त नहीं ।
पतझड़ के रोते आँगन में
लाना है
मधुमास हमें।
हिन्दी
की जय के
नारों से गुंजवाना आकाश हमें ।
दुलहन को
गहरा खतरा है बाराती – बारातों से ।
कब तक प्यास बुझा पायेंगे अश्कों की बरसातों से।
ऊपर से शुभचिंतक दिखने
वाले कुछ गद्दारों से ।
सावधान रहना है
हमको इन विष भरी बहारों से।
नहीं
स्वेद से,
शुद्ध रक्त से लिखना है इतिहास हमें।
हिन्दी
की जय के
नारों से गुंजवाना
आकाश हमें ।
हिन्दी का विरोध जो करता अपनी माँ
का दुश्मन है।
अपनी माँ, माँ ही होती है वेश्या किसकी दुलहन है।
अपनी कुटिया को ठुकराकर कोठी मद में फूल गए।
व्हिस्की के लालच में पावन पुण्य दूध को भूल गए।
अँगरेजी
को भारत से
अब देना है
वनवास हमें।
हिन्दी
की जय के
नारों से गुंजवाना
आकाश हमें।
चले गए अँगरेज
यहाँ से अँगरेजी क्यों बाकी है।
अपने ही शासन में जालिम चंगेजी क्यों बाकी है।
भारत की
एकता मर रही हिन्दी का संजीवन दो।
माँग
रही है भारत माता हिन्दी को तन, मन, धन दो।
हिन्दी
के अमृत से
सबकी मित्र बुझानी
प्यास हमें।
हिन्दी
की जय के
नारों से गुंजवाना
आकाश हमें।
हिन्दी से क्यों नफरत करते ऐसी भी
क्या उलझन है।
कितने ही
पैसे वाला हो लेकिन वह तो निर्धन है।
सभी रानियों
में पटरानी देवनागरी
हिन्दी है ।
कौन कहे पैरों की शुद्ध
‘मनीषी’ बिन्दी
है।
जिएँ – मरें
हिन्दी की खातिर
देना है विश्वास
हमें ।
हिन्दी
की जय के नारों
से गुंजवाना आकाश
हमें।
- डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
[ काव्य-संकलन 'आग के अक्षर' से ]

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