दीप से दीप जलाता जा - डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
दीप से दीप
जलाता जा
दीप से
दीप जलाता जा।
अपना अहम् गलाता
जा।
नफरत की दीवार
गिराकर प्यार के
बाग लगाता जा।
दरिया
भूल गया है अपनी मस्ती
भरी रवानी को।
सागर
तड़पे याद कर
रहा अपनी लुटी
जवानी को।
बगिया
को पतझड़ ने
घेरा कोयल चुप्पी
साध गई,
स्वारथ
ने आ घेरा
अब तो प्रेमिल मधुर
कहानी को।
मन में
आस जगाता जा।
प्यार की
प्यास बुझाता जा।
आँसू
को आँचल में
लेकर मोती सा
दुलराता जा।
नफरत की दीवार
गिराकर प्यार के
बाग लगाता जा।
लाशें
क्यों बेकफ़न जा
रहीं मेहनतकश इन्सानों
की।
चहल – पहल की जगह आ
गई खामोशी शमशानों की।
साधें क्यों क्वारी
रह जातीं कल्पवृक्ष
की धरती पर ,
फलने से पहले जल जाती
हैं
होली अरमानों की।
अपनी कलें
चलाता जा ।
श्रम से भूख
मिटाता जा ।
दुख का दूल्हा
खुशी की दुलहन फेरे सात
फिराता जा।
नफरत की दीवार
गिराकर प्यार के
बाग लगाता जा।
गुण की पूछ
नहीं क्यों होती
चाँदी की झनकारों
में।
आहों
का आदर उड़ता
है नफरत की
फुंकारों में।
शहनाई
की जगह क्रूर
कायर क्रंदन ने
ले ली है,
भूला
विश्व प्रेम की
भाषा बात
करे हुंकारों में।
बिछुड़े मीत
मिलाता जा।
मुरझे सुमन खिलाता जा।
सुख-
सावन से मन- धरती
की पूरी प्यास बुझाता
जा।
नफरत की दीवार
गिराकर प्यार के
बाग लगाता जा ।
माँ का दूध
लजा मत देना,
इसीलिए क्या पाला है।
‘राणा’
की रक्षा करने को
बन जाना फिर
‘झाला’ है।
सच्ची
परिभाषा जीवन की
दुखियों की सेवा
करना ,
जात- पात
का झगड़ा टंटा
यह तो बड़ा
कसाला है।
भेद का भूत
भगाता जा।
छूत का
प्रेत हटाता जा।
राष्ट्र
यज्ञ में तन
की समिधा देकर
हवन रचाता जा।
नफरत की दीवार
गिराकर प्यार के
बाग लगाता जा ।
नफरत
कितनी मिले न
बोलूँ मैं होठों
को सी लूँगा।
नीलकंठ सम
दुख-विष को भी नित्य ‘मनीषी’ पी लूँगा।
साथ
नहीं देता कोई
तो क्या कोई
मर जाता है ,
मैंने
जीना सीखा है
रे मैं एकाकी
जी लूँगा।
नव स्वर
छन्द सजाता जा।
वीणा मधुर
बजाता जा।
साँस-
साँस से संध्या
वन्दन करके हवन
रचाता जा।
नफरत की दीवार
गिराकर प्यार के
बाग लगाता जा।
दीप जला करता
है फिर भी
उसकी शक्ति अधूरी
है।
अंधकार को दूर कर
रहा सीमागत
मजबूरी हैं।
एक
व्यक्ति की अपनी
क्षमता औ’
सीमाएँ होती हैं ;
मंजिल
पास खड़ी है
फिर भी शेष
अभी कुछ दूरी है।
मिलकर कदम
बढ़ाता जा।
मंजिल पास
बुलाता जा।
दीप
भेंट कर अरे
पंक्ति को दीपावली
मनाता जा।
नफरत की दीवार
गिराकर प्यार के
बाग लगाता जा।
- डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
[ काव्य-संकलन 'आग के अक्षर' से ]

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