मानव सभी सामान हैं - डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
मानव सभी
सामान हैं
धरती की
सन्तान है।
मायत का सम्मान
है।
कौन
यहाँ पर ऊँचा – नीचा
हर कोई इन्सान
है।
सबकी
माँ को पीड़ा
होती गोरा हो
या काला हो ।
जोर फाँदने में
पड़ता है दरिया
हो या नाला हो।
तिनका
पड़े आँख में उड़कर दर्द
सभी को होता
है।
अच्छे
भले नेत्र हों
चाहे फूला हो
या जाला हो।
कहीं छाँव
है, धूप है।
कहीं रंग है
रूप है।
शैली
अलग-अलग हैं लेकिन
मूल एक आख्यान है।
कौन यहाँ पर
ऊँचा- नीचा हर कोई
इन्सान है।
रूप और धन
पाया है यदि
तो उस पर
इतराना क्या?
दिल में फाँस
चुभी हो गहरी
हँसना और हँसाना क्या?
जिस
आँगन में गीत
खुशी के बीच उसी के
क्रंदन है,
पीड़ा में सरगम
ना डूबी ताल, छन्द,
लय गाना क्या?
सुबह कहीं पर
शाम है।
होती उमर तमाम
है।
एक तत्व पर
रूप भिन्न हैं अलग-अलग
पहरान है।
कौन यहाँ
पर ऊँचा-नीचा हर
कोई इन्सान है।
भाई
अलग-अलग हो करके आपस
में ही झगड़ रहे।
जात-पात
का नारा देकर
इक- दूजे को रगड़
रहे।
दुनिया
पहुँच गई चन्दा पर
हम खाई के मेढ़क क्यों?
जात- पात का साँप मर गया
पूँछ उसी की पकड़ रहे।
गोत्रवाद के
दाग से।
संप्रदाय की आग
से।
चेहरे
झुलस गए हैं
सबके कहाँ गई
मुस्कान है।
कौन
यहाँ पर ऊँचा -नीचा
हर कोई इन्सान
है।
मन्दिर,
मस्जिद, गिरिजा की ये
सब दीवारें गिर जायें।
भेद भाव की
सब मीनारें बीच
समुन्दर तिर जायें।
धरती
माता के चेहरे
पर समानता मुस्काती
हो,
महल
झोंपड़ी एक गगन
के नीचे मिलकर फिर गायें।
हर आँगन में चाव हो।
भरा प्रेम
का भाव हो।
ईश्वर
है इस घर
का स्वामी हर
प्राणी मेहमान है।
कौन
यहाँ पर ऊँचा-नीचा
हर कोई इन्सान
है ।
मानवता
की दीपशिखा पर
दानवता यह जल जाये।
शोषण औ’ नफरत का सूरज पलक
झपकते ढल जाये।
ऊँच- नीच
के रक्त बीज को जड़ से अब उखाड़ फेंको।
मानव को झूठी
नकाब ये नहीं ‘मनीषी’ छल पाये।
दूर करो अभिशाप को।
छुआछूत के
पाप को।
कफ़न
ओढ़ते सस्ते – महँगे मिट्ठी
एक समान है ।
कौन
यहाँ पर ऊँचा -नीचा
हर हर कोई इन्सान है ।
- डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
[ काव्य-संकलन 'आग के अक्षर' से ]

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