मैं व्यथित भारत - डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
मैं व्यथित भारत
मरुथल को
साँस दे
वह आकाश ढूँढता हूँ।
घायल को दे
शरण वह वातास
ढूँढता हूँ।
किसने बहार
बनकर, पूरे
चमन को लूटा।
हमदर्द बन ‘मनीषी’ सारे वतन
को लूटा।
काँटों का दुख नहीं
है फूलों ने डंक
मारा।
लहरों से बच
गए तो खाने
लगा किनारा।
हारा
हुआ रथिक हूँ।
टूटा
हुआ रसिक हूँ ।
दीवालिया वणिक
हूँ।
भटका हुआ
पथिक हूँ।
पतझड़ को प्यार
दे वह, मधुमास
ढूँढता हूँ।
घायल को दे शरण
वह वातास ढूँढता
हूँ ।
किसने स्वतंत्रता को छुरियों से गोद
डाला।
विश्वास
की जड़ों को जड़ से ही खोद डाला।
गणतन्त्र क्यों कहूँ
मैं चाकू का तन्त्र है यह।
कैसे स्वतंत्र
कह दूँ मिट्टी का मन्त्र है यह।
उजड़ा हुआ चमन
हूँ।
टूटा हुआ
सपन हूँ।
रोता हुआ
हवन हूँ ।
आधा जला
कफ़न हूँ।
अपना लुटा –
पिटा सा इतिहास ढूँढता हूँ।
घायल को दे शरण
वह
वातास ढूँढता हूँ।
मंजिल तो दिख रही है पर राह खोजता हूँ।
चोरों के गाँव में
भी इक शाह खोजता हूँ।
कैसे ये
दौड़ जिसमें विश्राम
तक नहीं है।
मरते
हैं गीत लाखों पर
नाम तक नहीं है।
कैसा समय कुढंगा।
टैगोर आज
नंगा ।
रोटी है पुण्य
गंगा।
घायल पड़ा तिरंगा।
तारामती
सा दुखिया रोहतास
ढूंढता हूँ।
घायल को दे शरण
वह वातास ढूँढता हूँ।
जीवन के मंच पर अब संत्रास बढ़ गया
है।
निर्माण घट रहा
है पर नाश बढ़ गया
है।
चिन्ता की चाँदनी का
आकाश बढ़ गया है।
आँसू के
सागरों का उल्लास बढ़ गया है।
विध्वंस का सृजन
हूँ।
भैया रहित
बहन हूँ ।
रोता हुआ
नयन हूँ ।
पीड़ा का
आचमन हूँ।
शंकर
जहाँ छिपे वह
कैलाश ढूँढता हूँ।
सब स्वप्न मर गये हैं अब लाश ढूँढता हूँ।
- डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
[ काव्य-संकलन 'आग के अक्षर' से ]

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