पराये द्वार का याचक नहीं हूँ - डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
पराये द्वार का याचक
नहीं हूँ
रूप के
देश का ग्राहक
हूँ ।
घृणित सन्देश का वाहक नहीं हूँ ।
मैं चौखट पर
तुम्हारी आ गया
हूँ –पराये द्वार का
याचक नहीं हूँ ।
मेरे विश्वास
को आवास दे दो ।
मेरे हर शब्द को
इतिहास दे दो ।
तुम्हारा हूँ
तुम्हारा ही रहूँगा,
मेरे हर गीत को
मधुमास दे दो ।
जलाने मारने की कल्पना
हो – मैं ऐसे गीत
का गायक नहीं
हूँ ।
मैं चौखट पर तुम्हारी
आ गया हूँ – पराये
द्वार का याचक नहीं हूँ ।
घिरा अभिमन्यु सा
कातिल ठगों में ।
न बाकी
एक भी आँसू
दृगों में ।
सभी छलिया शिकारी से
हैं लगते ।
पड़ी हैं
बेड़ियाँ नन्हे पगों
में ।
बिंधे सब रोम
मेरे कंटकों से – मैं नाज़ो से पला बालक
नहीं हूँ ।
मैं चौखट पर तुम्हारी
आ गया हूँ – पराये
द्वार का याचक नहीं
हूँ ।
पराई आग में
जलना सिखा दो ।
किसी के दर्द में
ढलना सिखा दो ।
जो उलटी राह पर नित
चल रहे हैं,
उन्हें सन्मार्ग पर
चलना सिखा दो ।
भरे अध्याय नफरत के
हों जिसमें – मैं ऐसे ग्रन्थ का
वाचक नहीं हूँ ।
मैं चौखट पर तुम्हारी
आ गया हूँ – पराये द्वार का
याचक नहीं हूँ ।
घिरा मझधार
में पतवार दे दो ।
बिना
आधार हूँ आधार
दे दो ।
मुझे दो
प्रेम का वरदान भगवन् !
नहीं नफरत सभी को
प्यार दे दो ।
नहीं संगीत हो जिसमें
मिलन का -- मैं ऐसे वाद्य का वादक
नहीं हूँ ।
मैं चौखट पर तुम्हारी
आ गया हूँ –पराये द्वार का
याचक नहीं हूँ ।
है अर्थी
संग ये बारात
कैसी ?
जहर की
हो रही बरसात
कैसी ?
स्वाति की बूंद
है स्वीकार लेकिन,
सनी है खून
में सौगात
कैसी ?
आदमी –आदमी को
खा रहा है – लहू
पी लूँ मैं वो
चातक नहीं हूँ ।
मैं चौखट पर तुम्हारी
आ गया हूँ –पराये द्वार का
याचक नहीं हूँ ।
मुझे तुम
देश या परदेश
दे दो ।
प्रतीक्षा है
कोई आदेश दे दो ।
जिधर भेजोगे
जाऊंगा उधर ही,
सभी को
वेद का सन्देश
दे दो ।
रहेगी याचना हर
बार यह ही – सिपाही
हूँ तेरा, नायक
नहीं हूँ ।
मैं चौखट पर तुम्हारी
आ गया हूँ –पराये द्वार का
याचक नहीं हूँ ।
मरुस्थल –
हित मुझे बादल
दो ।
हर इक आँसू को
गंगाजल बना दो ।
प्रभो !
निर्बुद्धियों को बुद्धि
दे दो,
‘मनीषी’ को भले
पागल बना दो ।
नहीं कल्याण हो दुनिया
का जिसमें -- मैं ऐसी
साध का साधक हूँ ।
मैं चौखट पर तुम्हारी
आ गया हूँ –पराये द्वार का
याचक नहीं हूँ ।
- डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
[ काव्य-संकलन 'आधा कफन' से ]

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