दहेज - डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
दहेज
सोने
की हथकड़ी काट
दो मारो दुष्ट
दहेज को ।
माथे पर कालिख
वाले फाड़ो हर
दस्तावेज को ।
कितने सपने
इसके कारण बिन
ब्याहे रह जाते हैं।
इच्छाओं के
शव नंगे ही अश्कों
में बह जाते हैं।
पूजा के
फूलों को अंगारों
से कुचला जाता
है ।
कुड़मल
कलियों को निर्दय हाथों से मसला जाता है।
छिने न पायल
पाँव से ।
धूप लड़ी क्यों छाँव से
।
खून से रँगने दो
न चुनरिया फिर
ज़ालिम रँगरेज को।
सोने
की हथकड़ी काट
दो मारो दुष्ट
दहेज को ।
वादों की
वसुधा सूखी है
आश्वासन बेहोश हैं।
बंधन की
गाँठें ढ़ीली हैं सहमे
से आगोश हैं।
काजल
की सिसकी,टूटी चूड़ी के रुदन विलापों से।
बेटी वाले
डरे हुए हैं बेटे
वाले बापों से ।
लालच भरे
प्रसंग को।
खाते पीते
नंग को।
करके बिस्तर गोल
भगा दो स्वारथ के
अँगरेज को।
सोने
की हथकड़ी काट
दो मारो दुष्ट
दहेज को ।
सबसे घटिया छन्द यही
है जीवन की रामायण में।
रक्त
बीज- सा फैल गया है यह जीवन के कण-कण में।
गीता को
कलुषित करने का श्रेय इसी
को जाता है।
बचो-बचो रावण फिर से
सीता को हरने आता है।
बुझा चमन की आग को।
मिटा वतन के दाग
को।
रोग ठीक करना
चाहो तो तोड़ो मत परहेज
को ।
सोने की
हथकड़ी काट दो मारो
दुष्ट दहेज को ।
कितनी गीता
गंगा माँ की
गोदी में सो जाती
हैं।
कितनी सीता
रेल-पटरियों पर लोहू बो
जाती हैं।
कौन कुँए
में कूद गई है, गिरी कौन
मीनारों से ।
कौन गिनेगा इनकी संख्या
रोज रँगे अखबारों से।
धरम बेचने वालों
तुम ।
शरम बेचने
वालों तुम ।
फिर से क्यों ज़िन्दा करते
हो मरे हुए
चंगेज को।
सोने की
हथकड़ी काट दो मारो
दुष्ट दहेज को ।
पूछो चौखट- आकर
खाली लौट गई बारातों से।
सजी
हुई सूनी सेजों
से सूखी सुहागरातों
से ।
जलती संबंधों की होली
क्वारी मस्तक- रोली से।
फेरों के पश्चात्
बाप की चौखट अटकी डोली से।
बेच रहे हो अपनों को ।
हवन कुण्ड
के वचनों को।
वे
पगले जो संतानों
से तोलें कुर्सी -मेज
को।
सोने की
हथकड़ी काट दो मारो
दुष्ट दहेज को।
पूछ रही झोंपड़ी
महल से चाँदी की
दीवारों से।
माँग रही
है न्याय माँग
अब सिन्दूरी हत्यारों से।
सभ्य-शरीफों की नकाब
में छिपे हुए बटमारों से।
पूछ रहे
हैं गीत ‘मनीषी’ के इन ठेकेदारों
से।
शब्द हुए
बेहाल हैं ।
जलते हुए सवाल
हैं ।
कब तक ठोकर
मारोगे यों ही मिट्टी जरखेज को।
सोने की
हथकड़ी काट दो मारो
दुष्ट दहेज को।
कब तक
अरमानों के घर
में आग लगाई जाएगी?
कब तक डोली
के बदले अर्थी
सजवाई जाएगी?
कब तक खुशी प्रताड़ित होगी सिसकी सम्मानित होगी?
कब तक मेरे देश
की नारी यों
ही अपमानित होगी?
सब प्रश्नों को
ले जाये।
कोई उत्तर
दे जाये ।
अंगारों
की चिता बनाओ मत फूलों की सेज को ।
सोने की
हथकड़ी काट दो मारो
दुष्ट दहेज को।
- डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
[ काव्य-संकलन 'आग के अक्षर' से ]

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