अन्धा आदेश - डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’

                           अन्धा   आदेश
              जग  ऊपर  से  गोरा -गोरा   मन-बसता  विषधर  काला  है।
              स्वर्ण  कलश  में   सुन्दर -सुन्दर  जहरीली नीली  हाला  है।
अन्धे आदेशों  के  आगे  कैसे  शीश  झुका  दूँ  अपना।
कैसे   झुठला  दूँ  सच्चाई, सत्य  मान  लूँ कोरा  सपना।
गूँगा, बहरा,  बौना  बनकर  कैसे  कह दूँ  काग  हंस  है।
मेरा  मनुज अभी जिन्दा है, मुझमें अभी शेष  ज्वाला है।
              मन  का  मानसिंह   सुविधा  रूपी  अकबर  के पैर धो  रहा ।
              तन  का  तोरण  द्वार   गिराकर  मुकुट  जूतियों  बीच  रो रहा।
              तुम  बन  जाओ शक्ति सिंह मैं पीथल  बन  सन्देश  लिखूंगा।
              कैसे   मरने  दूँ   प्रताप को, जबकि  यहाँ  जीवित  झाला  है।
हृदयंगम  कर  लिया  कि मैंने गीता का उपदेश अमोला।
आत्मतत्व मरता न कभी पर तन बदला करता है चोला।
मेरा  दर्द  छीन  मत  ले  जायें  खुशियों  के चोर- लुटेरे ।
इसलिए   पीड़ा  पीकर  होठों  पर  लगा  लिया  ताला है।
               सत्य- शिवा,  असत्य – मुगलों के बंधन में कैसे रह सकता।
               जिसका  तन-मन बर्फ बन गया वह चन्दन कैसे सह सकता।
               मंच    पुराना,   अभिनय  नूतन,  जानी-अनजानी   आवाजें,
               पाखण्डी  संन्यासी  कर  में  ले  चलता   नकली  माला  है।
कड़वा  सच बोलूँगा  मैं तो  चाहे कलम  छीन  तुम लेना।
क्यों झूठा तुम गर्व  कर रहे  काग़ज  स्याही  भी  मत देना।
मेरी उँगली  कलम   बनेगी,  दिल  का  रक्त  बनेगा  स्याही।
धरती -अम्बर   पर  लिख  दूंगा  दिल में  दर्द  बहुत  पाला  है।

भू   अम्बर  पर  लिखूँ  ‘मनीषी   फूटा  नहीं  अभी  छाला है। 

-  डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
 [ काव्य-संकलन 'आग के अक्षर' से ]

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