हाथ पकड़ तदबीर का - डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’

         हाथ   पकड़   तदबीर   का
                सपने  तो  सपने  होते हैं।
                सपने कब अपने होते हैं।
तोड़  रूढ़ियों  की कारा  दे  छोड़  ध्यान  जंजीर का।
मेंहदी मेहनत की रच ले खुद हाथ पकड़ तदबीर का।
                आँसू   से   भीगें ना प्रातें।
                लौटें   चिंता   की  बारातें।
तेरे   रहते  हो न  कहीं  अब  हरण द्रौपदी -चीर का ।
मेहनत की मेंहदी रच ले खुद हाथ पकड़ तदबीर का।
              संकट   तो  आते  रहते  हैं ।
              वीर किन्तु  गाते  रहते  हैं  ।
संकट  में  घबरा  जाये  यह  काम  नहीं  रणधीर का।
मेहनत की मेंहदी रच ले खुद हाथ पकड़ तदबीर का।
            क्रम  तेरा  सबसे  पहला  है ।
             तू  तो  नहले   पर  दहला है।
मनुज हाथ पर हाथ न रख अब दिखा हाथ शमशीर का।
मेहनत की मेंहदी  रच ले  खुद  हाथ पकड़ तदबीर का।
           भाग्यवाद   का   छोड़  सहारा।
            क्यों  फिरता  है  मारा -मारा ।
श्रम न करे  पगले  यदि तो क्या दोष बता तक़दीर का।
मेहनत की  मेंहदी रच ले खुद हाथ पकड़ तदबीर का ।
           सब  साधन  सम्पन्न, दीन क्यों?
           शक्तिमान  मन  बना  हीन क्यों?
नवयुग  का  निर्माता बन क्यों बना फकीर लकीर का।
मेहनत  की मेंहदी रच ले खुद हाथ पकड़ तदबीर का।
              माना    तू   भगवान   नहीं   हैं।
              क्या  फिर  भी  इन्सान नहीं है?
 हैं तुझमें  उत्साह  ‘मनीषी, गंगा  जैसे   नीर   का ।
मेहनत की मेंहदी  रच  ले  खुद  हाथ  पकड़  तदबीर का।


- डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’

 [ काव्य-संकलन 'आग के अक्षर' से ]

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