‘अँधियारे की हथकड़ी - डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
‘अँधियारे की
हथकड़ी
मैं डगर -डगर
नव दीप जलाऊँगा,
ज्यों अँधियारे की छाती छिल
जाये।
सूरज ने
डरकर अँधियारे से ही
,
अपनी
नीयत कुछ गन्दी कर ली है।
या तम ने चाल ‘मनीषी’ वह चल दी,
किरणों की सेना
बन्दी कर
ली है।
फिर नवल
क्रांति की आग
लगाऊँगा।
सब
गद्दारों को हो
मुश्किल जाये ।
शोषण की
ऐसी सूखी लहर
चली,
अश्वत्थामा भूखा रह
जाता है ।
वह मलय पवन कुछ फूलों तक आई,
सारा कानन
सूखा रह जाता
है ।
मैं
हाथों में अमृत कण लाऊँगा—
जिन्दा
लाशों को जीवन
मिल जाये।
जन - सागर में ऐसी लहरें
आईं,
जिनने मणियों को खुद
ही लूट लिया।
मानव से
मानवता ऐसे भागी,
जैसे सजनी से
प्रियतम रूठ लिया।
मैं ऐसी मोहक
बीन बजाऊँगा –
जिससे
जहरीला विषधर किल जाये।
गैरों
को देना दोष नहीं
अच्छा,
अपनों से ही
कुछ भूल हुई भाई।
कलियों को
काँटों ने मिलकर
लूटा,
मैंने पीड़ा
से भाँवर डलवाई।
मैं
आँखों से सावन
बरसाऊंगा –
दिल की
सूखी सी बगिया
खिल जाये।
धनकीटों ने
मेहनत की पीड़ा
से,
बलपूर्वक कर दी आज
सगाई है।
सींची हैं
खून पसीने से
बगिया ,
लेकिन फल
की दुलहन हरजाई है।
समता की ऐसी
ज्योति जलाऊँगा –
धनवानों
का सिंहासन हिल
जाये।
मैं डगर-डगर
नव दीप
जलाऊँगा –
ज्यों
अँधियारे की छाती
छिल जाये।
- डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
[ काव्य-संकलन 'आग के अक्षर' से ]

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