तथ्य - डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
तथ्य
मैने प्यार
किया है तुमसे फिर
क्यों रूठ गई ।
जीवन की हर आशा
पगली मुझको लूट गई।
चर्खा चलता चला उमर का काता सूत
नहीं।
साथ- साथ रह चुके
भेद का भागा भूत
नहीं।
प्राणों की
बुढ़िया तन लठिया टेक -टेक चलती।
इच्छाएँ रह
गई निपूती जन्मा
पूत नहीं ।
वैतरणी
के बीच पूँछ
गैया की छूट
गई।
जीवन की हर
आशा पगली मुझको लूट गई।
समय – सिपाही ने
जीवन –जनता को लूट लिया।
कलश अमृत का
राहु -केतु के हाथों फूट लिया।
सीता रूपी पवित्रता धरती में समा गई।
आदर्शों का राम
मनुज के हाथों
छूट लिया।
प्यासे के
आगे गगरी
पनघट पर फूट गई।
जीवन की हर
आशा पगली मुझको लूट
गई ।
सत्य जिंदगी
का उभरा मत कोई
प्यार करो।
यदि करते
हो प्यार दुखों से मत
इन्कार करो।
तथ्य
यही है नेकी करके
दरिया में डालो ।
कुछ भी मेरा नहीं यहाँ इसको
स्वीकार करो।
पीना
पड़ा गरल छक-छक
अमृत की घूँट गई।
जीवन की
हर आशा
पगली मुझको लूट गई ।
माया, तृष्णा, मोह, भरम इस
तन में पलते हैं।
मंजिल मिलती नहीं ‘मनीषी’ यों ही चलते है।
खुजली चली वासना की तो द्वार निकल भगा।
गैरों का क्या
दोष हमें अपने ही छलते हैं।
सत्य- दुग्ध
में असफलता क्यों विष-वट कूट
गई।
जीवन की हर
आशा पगली मुझको
लूट गई।
- डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
[ काव्य-संकलन 'आग के अक्षर' से ]

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