आरती उतारा करते हैं - डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
आरती
उतारा करते हैं
सुख-सेज स्वयं
ठुकराकर हम काँटों से
गुजारा करते हैं ।
दुख- दर्द
को अपनाकर हँसकर खुशियों से किनारा करते हैं।
सिंहों के पकड़ जबड़े हम तो
दाँतों को गिना करते हैं सदा।
अंगारों को खा- खा करके हँस-हँस के
स्वयं मरते हैं सदा।
अपने हाथों से मौत
– दुल्हन की माँग
सँवारा करते है।
दुख- दर्द को अपनाकर हँसकर खुशियों से किनारा करते
हैं।
हम बैठ
किनारों पे न सदा लहरों का हिसाब
लगाते हैं।
पतवार बिना, नौका
खेते बंजर में
फूल उगाते है।
छाती पे
चढ़के समुन्दर की
भँवरों को पुकारा
करते हैं।
दुख- दर्द को अपनाकर हँसकर खुशियों से किनारा करते
हैं।
छोटा न बड़ा कोई
हममें सब पक्षी हैं इक
डाली के।
मंजिल है एक डगर अनगिन सब फूल
एक ही माली के।
आँसू
को हथेली पे
रखके मोती सा
दुलारा करते हैं।
दुख- दर्द को अपनाकर हँसकर खुशियों से किनारा करते
हैं।
जो दानव
हैं हम उनके लिए
दुर्गा के तेज
दुधारे हैं।
दुश्मन के लिए
दावानल हैं,
विष हैं जलते
अंगारे हैं।
प्रेमी के लिए
पथ को हरदम
पलकों से बुहारा करते हैं।
दुख- दर्द को अपनाकर हँसकर खुशियों से किनारा करते
हैं।
अरिमुंडो की माला माँ
को हम भेंट सदा करते
आये।
जीने के लिए
हँस – हँस के सदा
बालकपन से मरते आये ।
शोणित को
समझ गंगाजल हम चरणों को
पखारा करते हैं।
दुख- दर्द को अपनाकर हँसकर खुशियों से किनारा करते
हैं।
हर बात
निभाते हैं अपनी, प्यासों
को सुधा पिला करके।
तन का
दीपक, मन की बाती, साँसों की
धूप हिला करके।
भारत
माता की रात
दिवस आरती उतारा
करते हैं।
दुख- दर्द को अपनाकर हँसकर खुशियों से किनारा करते
हैं।
हम कफ़न
बाँधकर निकले हैं तूफान से
टकराना जानें।
गोविन्द सिंह
के पुत्र सबल
कब मौत से
घबराना जानें।
दीवारों में
चिनवा खुद को किस्मत को
निखारा करते हैं।
दुख- दर्द को अपनाकर हँसकर खुशियों से किनारा करते
हैं।
पर
हित में दान हड्डियों का
बनकर दधीचि कर देते हैं।
भिक्षा का पात्र ‘मनीषी’ हम
दे दान तुरत
भर देते हैं।
भूचाल
धरा पर आता
जब थोड़ा सा इशारा करते
हैं।
दुख- दर्द को अपनाकर हँसकर खुशियों से किनारा करते
हैं।
- डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
[ काव्य-संकलन 'आग के अक्षर' से ]

Comments
Post a Comment