भुला दिए सरदार पटेल - डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
भुला
दिए सरदार पटेल
थमा
चुके अपने हाथों से पगलों
को देश की नकेल।
गद्दारों
को याद कर
रहे भुला दिये सरदार
पटेल।
एक साथ पांच
सौ रियासत के नागों को कील दिया।
भारत माँ को
जिसने भी गाली दी उसको छील दिया।
लौह पुरुष की वज्र
दृष्टि से कोई कंस न बच पाया।
लेकिन मिट्टी के
शेरों को यह सब रास नहीं
आया।
कुछ लोगों ने
आजादी को समझ लिया है निजी रखैल।
गद्दारों
को याद कर
रहे भुला दिये
सरदार पटेल।
सच
कहता हूँ
लोग जिन्दगी को जीने से ऊब गये।
कितने लोग
आँसुओं की बरसातों में
ही डूब गये।
चाकू, छुरियों की बन
आई, चलती गोली
की आँधी।
मेरे देश
में लगा कत्ल है
होने रोज-रोज गाँधी।
कई शिकारी
खेल रहे दोनों हाथों से अपना खेल।
गद्दारों
को याद कर रहे भुला
दिये सरदार पटेल ।
देश जल रहा सारा लेकिन कुछ भी नजर न आता है।
अपने आकाओं का तो
केवल कुर्सी से
नाता है।
कुछ जयचंद देश
के टुकड़े करने की हैं
सोच रहे ।
कुछ निर्दय
माली बगिया की पत्ती-पत्ती नोच रहे।
सारा भारतवर्ष लगे है
हमको खुली हुई इक जेल।
गद्दारों
को याद कर
रहे, भुला दिये सरदार पटेल।
भाषण बहुत
सुन चुके हैं भूखे- नंगों
को राशन दो।
अनुशासन खो गया,देश को फिर से नव अनुशासन दो।
अभी नहीं कुछ भी बिगड़ा है
रहते समय जाग जाओ।
वरना जनता कह देगी
सिंहासन छोड़ भाग
जाओ।
तेल नहीं मिलता लेकिन हम सबका निकल गया है तेल।
गद्दारों
को याद कर
रहे, भुला दिये
सरदार पटेल।
देख लिए
इनके तो जलवे युवको ! कुछ करना होगा।
भारत माँ जी
सके इसलिए हमको फिर मरना
होगा।
देव दयानन्द के सिपाहियो ! दृष्टि तुम्हीं पर टिकी हुई ।
आज आत्मा अपने नेताओं की
तो है बिकी
हुई।
महँगाई मारती
‘मनीषी’ जैसे नोचे
लाश चुड़ैल।
गद्दारों
को याद कर रहे
भुला दिये सरदार पटेल ।
- डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
[ काव्य-संकलन 'आग के अक्षर' से ]

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