घायल पड़ी बहार है - डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
घायल
पड़ी बहार है
पतझड़
हँसता मुस्काता है
घायल पड़ी बहार
है।
कैसा
रामराज्य आया हर
फूल बना अंगार है।
आदर्शों की सड़ती लाशें
फैशन की चौपाल में।
बहुत लड़खड़ाहट
आई है सच्चाई की चाल में।
पूजा बन्दी
है मन्दिर में
कैदी है भगवान
यहाँ ।
मानवता संन्यास ले
चुकी अपमानित सम्मान
यहाँ।
नफरत का
ही नाम दूसरा
इस दुनिया में प्यार
है।
कैसा
रामराज्य आया हर
फूल बना अंगार
है ।
स्वारथ की
फसलें लहराती हैं मन
के उद्यान में।
अन्तर नहीं दिखाई पड़ता
बगिया या शमशान में।
चाँदी की
चाबी से ताले
सारे ही खुल
जाते हैं ।
कंठ
कोकिलों के बैठे
हैं कव्वे गीत
सुनाते हैं।
एक कली की
बात नहीं है
बगिया ही बीमार
है।
कैसा
रामराज्य आया हर फूल
बना अंगार है।
चाकू, छुरियों
का शासन है
बेशर्मी के राज
में ।
बगुलों का आदेश चल रहा हंस
मयूर समाज में।
सस्ता खून
शान्ति महँगी है
हाथों में अब आग है।
मन का
दर्पण दिखला देता
चेहरे का हर
दाग़ है ।
पढ़ा और बेकार ‘मनीषी’ जीवन वह अखबार
है।
कैसा
रामराज्य आया हर
फूल बना अंगार
है।
बिका – बिकी
का खेल
चल रहा बेच
रहे वातास को।
कुछ काँटों,कलियों
ने मिलकर बेचा है मधुमास को।
बेटी, बहन बेच दी
पत्नी कफ़न बेचता लाश को ।
नीड़ बेच
डाला पहले अब बेच रहे आकाश को।
देश,
धर्म, तन-मन का
चलता खूब यहाँ
व्यापार है।
कैसा
रामराज्य आया हर फूल बना
अंगार है। आग के अक्षर/पृष्ठ ४५
- डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
[ काव्य-संकलन 'आग के अक्षर' से ]

Comments
Post a Comment