गीत और पीड़ा - डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
गीत और पीड़ा
जितनी दूर आग
से गर्मी।
जितनी दूर सन्त
से नर्मी।
जितनी दूरी
पंक कमल औ’ नीर से।
उतनी दूर गीत
रहता है पीर से।
जितनी दूर
स्वर्ण से लंका।
जितनी दूर हृदय
से शंका।
रावण जितनी दूर ‘मनीषी’ तीर से।
उतनी दूर गीत रहता है
पीर से।
यादें जितनी
भूतकाल से।
मेधा जितनी
तर्क जाल से।
जितनी दूर
पराक्रम रहता वीर से।
उतनी दूर गीत रहता है पीर से।
कंगाली से आटा गीला।
हठ से
जितनी दूर हठीला।
मस्ती रहती
जितनी दूर फकीर से।
उतनी दूर गीत
रहता है पीर से।
जितनी
दूर चोर से
चोरी।
शैशव से जितनी
है लोरी।
श्राद्ध पक्ष में
ब्राह्मण जितना खीर से।
उतनी दूर गीत
रहता है पीर से।
गीता जितनी दूर ज्ञान से।
ध्यानी जितनी दूर
ध्यान से।
कविता रहती जितनी दूर कबीर से।
उतनी दूर गीत रहता
है पीर से।
- डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
[ काव्य-संकलन 'आग के अक्षर' से ]

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