डरा -डरा सा मन - डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
डरा -डरा सा मन
थका -
थका सा
तन है उस
पर डरा- डरा सा मन।
पहले
पल में प्यार
हुआ तो दूजे
में अनबन।
मेघों का निष्कासन
अब तो करता
है अम्बर।
आँख दिखाता है मुखिया को अब
तो सारा घर।
बाल
सुलभ क्रीड़ाओं से
वंचित भोला बचपन।
थका -
थका सा
तन है उस
पर डरा- डरा सा मन।
काजल का आँखों
से झगड़ा पायल का पग से।
कैसे मंजिल मिले
पंख रूठे घायल
खग से।
यहाँ
संगठन दिखलाई पड़ता
केवल विघटन।
थका -
थका सा
तन है उस
पर डरा- डरा सा मन।
नयनों के
पनघट ऊपर आँसू
की पनिहारिन ।
रोती- रोती
गाती है पीड़ा
की बंजारिन।
पोंछ
रहा सिन्दूर दुल्हन
का निज कर
से साजन।
पहले
पल में प्यार
हुआ तो दूजे
में अनबन।
अंधों में
राजा बन बैठे
हैं बुद्धू काने ।
कुंठित कोकिल
के स्वर कव्वे
गाते हैं गाने ।
वृद्धों
को करना पड़ता
बच्चों का पालागन ।
थका – थका
सा तन है
उस पर डरा- डरा सा
मन।
शबनम पर
बैठा है जालिम शोलों
का पहरा।
किससे करें
निवेदन मौसम है
गूँगा - बहरा।
कैसी
उलटी रीति अगन
बरसाता है सावन।
पहले
पल में प्यार
हुआ तो दूजे
में अनबन ।
पूर्वाग्रह की गहरी
धूल जमी है
चिन्तन पर।
लक्ष्मी का शासन
है सरस्वती के आसन पर।
बहुत खोखला
हुआ ‘मनीषी’ दूषित हुआ मनन।
थका – थका
सा तन है
उस पर डरा- डरा सा
मन।
- डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
[ काव्य-संकलन 'आग के अक्षर' से ]

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