दूर क्रन्दन कर दो - डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
दूर क्रन्दन कर दो
सर्जक पालक
संहारक जग को
नन्दन कर दो ।
सकल विश्व रो
रहा दूर सारा
क्रन्दन कर दो ।
तेरे कल्पवृक्ष में
विष के फल
लगने लग गए ।
योगी सोये,
रातों को रावण
जगने लग गए ।
पारस के नगराज
लौह को फिर कुन्दन कर दो ।
सकल विश्व रो
रहा दूर सारा
क्रन्दन कर दो ।
जब-जब अटके तब-तब आकर पार निकाला
है ।
जब-जब भटके तब-तब
तुमने हमें सँभाला है ।
धूल लगे जिस
माथे पर उसको चन्दन कर दो ।
सकल विश्व रो
रहा दूर सारा
क्रन्दन कर दो ।
तेरा, मेरा
भाव सभी की
उंगली पकड़े है ।
स्वार्थ–रूप अजगर
तन-मन-मेधा को जकड़े है ।
कुंठाओं से घिरा
विश्व ढीले बन्धन
कर दो ।
सकल विश्व रो
रहा दूर सारा
क्रन्दन कर दो ।
मजहब की
नदियों में फिर से बाढ़
आ गई है ।
सम्प्रदाय की नागिन
सच्चा धर्म खा गई
है ।
कृपासिन्धु फिर से
सबका वैदिक चिन्तन कर दो ।
सकल विश्व रो
रहा दूर सारा
क्रन्दन कर दो ।
नफरत के खेतों में
दिखता किंचित प्यार नहीं ।
पतझड़ के निर्दय
शासन में दिखे बहार
नहीं ।
निर्वासित मधुमासों
का फिर
अभिनन्दन कर दो ।
सकल विश्व रो
रहा दूर सारा
क्रन्दन कर दो ।
ऐसा ज्वार उठा
जलते सब ही भव सागर में ।
अमृत नहीं,
भरा है विष सबकी
मन-गागर में ।
मौन ‘मनीषी’ मन - मंदिर में मृदु मन्थन कर दो ।
सकल
विश्व रो रहा
दूर सारा क्रन्दन कर
दो ।
- डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
[ काव्य-संकलन 'आधा कफन' से ]

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