राजनीति की परिभाषा - डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
राजनीति
की परिभाषा
आज देश के अम्बर पर तो छाया गहन कुहासा
है।
लूटो
और खसूटो राजनीति
की यह परिभाषा
है।
कुछ तो हमको लूट लिया
सैंतालिस की
आजादी ने।
लेकर नाम सदा गाँधी
का लूटा नकली
खादी ने।
काँटों से तो
बच निकले
थे फूलों की गुटबन्दी
ने।
वृद्धों और कुँवारों
को मारा ज़ालिम
नसबन्दी ने।
रोज
विदूषक और मदारी करता
नया तमाशा है।
लूटो
और खसूटो राजनीति
की यह परिभाषा
है।
भानुमती के कुनबे
के कुर्सी के अंधे रगड़े ने।
‘जनता’
का भट्ठा बैठाया शिखंडियों
के झगड़े ने।
पूर्ण
चमन का दम घोंटा था चलती हवा विषैली ने।
कमर
तोड़ दी थी जनता की रोज- रोज की रैली ने।
जनता का शासन
जनता के प्राणों का ही प्यासा है।
लूटो
और खसूटो राजनीति
की यह परिभाषा
है।
‘देवी’ की पहचान हुई थी ‘नारंग’ औ’
‘मस्तान’से।
‘शुद्ध शान्ति’की समता हमने देखी कब्रिस्तान से।
उनकी
नजरों में भी मानव अधिक नहीं था पिल्ले से।
जनता शासन की
पहचान हुई थी रंगे बिल्ले से।
वादे कालपात्र
बन बैठे आश्वासन इक
झाँसा है।
लूटो
और खसूटो राजनीति
की यह परिभाषा
है।
पुनः लुटेरों
के हाथों में आई
घर
की ताली है।
चोरी का अब
डर कैसा जब
चोरों की रखवाली है।
सारे दुखी
हुए बैठे
कैसे कह दूँ
खुशहाली है।
कलियाँ कैसे हँसें बताओ
हुआ कसाई माली है।
हम तो सीधा समझ
रहे थे उल्टा पड़ गया पासा है।
लूटो
और खसूटो राजनीति
की यह परिभाषा
है।
लड़ती हैं बिल्ली
आपस में बन्दर
उनको डांट रहे।
अंधे अपनों को
रेवड़ियाँ भर-भर झोली
बाँट रहे ।
जिस डाली
पर बैठे हैं पगले उसको ही काट रहे
।
अधिक कहूँ क्या ये हजरत
भी थूक-थूक कर चाट रहे।
आँसू पी लो दुख को
खा लो आशा यहाँ निराशा है।
लूटो
और खसूटो राजनीति
की यह परिभाषा
है।
सत्ता तो वेश्या
है भैया नहीं
एक की रहती है।
मैं ही कब कहता
हूँ ऐसा सारी दुनिया कहती है ।
यही रही हालत तो
उलझन बहुत बड़ी हो
जाएगी।
पाँच साल से
पहले -पहले खाट खड़ी हो जाएगी।
मथुरा हुई ‘मनीषी’ मोहन का हर झूठ दिलासा है ।
लूटो
और खसूटो राजनीति
की यह परिभाषा
है।
- डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
[ काव्य-संकलन 'आग के अक्षर' से ]

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