कवि दुनिया है - डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
कवि दुनिया
है
कवि तो अपने
में ही इक
पूरी दुनिया है।
दे बना हार
को जीत कलम
का झुनिया है ।
कवि की
गोदी में त्रिभुवन
सोते रहते हैं।
सब कर्म
सुकवि अन्तस में
होते रहते हैं।
कुल सृष्टि
दुधमुँही बच्ची सी क्रीड़ा करती।
लेखनी विश्व की
खाली झोली को भरती।
निर्माण -सृजन अंतर में हँसता गाता
है।
चंचल शिशु
सा प्रलयी उत्पात मचाता है।
धुन रहा ‘मनीषी’ जग को पूरा धुनिया है ।
कवि तो अपने
में ही इक
पूरी दुनिया है।
हृदयांगण गगन समान
हास्य का स्रष्टा है।
हैं दिव्य
नयन तीनों कालों
का द्रष्टा है।
मन-मन्दिर में जीवन औ’ मरण नृत्य करते।
शब्दार्थ भृत्य सम उसके सभी कृत्य
करते।
सारी वसुन्धरा ही
उसका अपना घर है।
बिन डरे
विचरता उसे न कोई भी डर
है।
बींधता मर्म,
कर कर्म
धर्म का बुनिया है।
कवि तो अपने
में ही इक
पूरी दुनिया है।
वह सत्य, शिवं, सुन्दर
का अनुपम गायक है।
कवि और
मनीषी युग का निर्भय
नायक है।
जल, थल,औ’गगन,पवन में उसकी गति सम
है।
वह सूत्रधार जग में
न किसी से भी
कम है।
जगती के चातक मन को
स्वाति – सरोवर है।
हर भूले भटके
पथिक के लिए घर-वर
है।
वह विश्व- बाल के लिए
एक झुनझुनिया है।
कवि तो अपने
में ही इक
पूरी दुनिया है।
वह सागर
मंथन कर जग को अमृत देता।
वह शंकर है
अपने हिस्से में
विष लेता।
साधना स्वयं
करता फल दुनिया को देता।
काँटों का ताज
ओढ़ता बिन कुर्सी-नेता ।
वह अमृत वर्षी
मेघ झुलसते मरुथल को।
वह
भूत, भविष्यत, वर्तमान
बीते कल को।
औरों को
मरहम है
चाहे खुद दुखिया है।
कवि तो अपने
में ही इक पूरी
दुनिया है ।

- डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
[ काव्य-संकलन 'आग के अक्षर' से ]
Comments
Post a Comment