उस दिन मर जाऊँगा - डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
उस दिन मर
जाऊँगा
काम
अधूरे थोड़े से
पूरे कर जाऊँगा।
जिस दिन मेरा
कवि मर जाये मैं मर जाऊँगा।
मैं अभिमन्यु पता
है छल से
मारा जाऊँगा।
अंतिम साँस तलक
अपने जौहर दिखलाऊँगा।
देह जले लेकिन
अपने गीतों में जीऊँगा।
नीलकंठ, बन
दयानन्द जग का विष
पीऊँगा ।
गीतों
की खुशबू बनकर
मैं घर- घर जाऊँगा।
जिस दिन मेरा कवि मर जाये
मैं मर जाऊँगा।
मैं गुमनाम नींव
का पत्थर भवन
न बन पाया।
किसी देवता के चरणों में नमन
न बन पाया।
उलझा रहा सिर्फ छन्दों में
भजन न बन पाया ।
जला-जलाया दुनिया को पर हवन
न बन
पाया।
जग की खाली
झोली खुशियों से भर जाऊँगा।
जिस दिन मेरा कवि
मर जाये मैं मर जाऊँगा।
गा जाऊँगा
गीत सृजन के
मैं सन्नाटों में।
सुख की
गंगा ला दूँ
मन के सूखे घाटों
में ।
निकले मुख से
आह नहीं पीड़ा
के चांटों में।
आग लगा
दूँ पाखंडों के
क्रूर कपाटों में।
अरे शकुनियो
! यह न समझना मैं डर
जाऊँगा।
जिस दिन मेरा
कवि मर जाये मैं मर
जाऊँगा ।
सुविधा से
समझौता करना कभी
नहीं जाना।
पीड़ा से तो
परिचय गहरा सुख से
अनजाना।
हर लावारिस
आँसू लगता जाना
पहचाना ।
खुशियाँ गुजरे
रोज पास से
मार-मार ताना ।
मैं नन्हा सा फूल
‘मनीषी’ खुद झर जाऊँगा।
जिस दिन मेरा
कवि मर जाये मैं
मर जाऊँगा
- डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
[ काव्य-संकलन 'आग के अक्षर' से ]

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