क्रान्ति वहाँ पर आई होती है - डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
क्रान्ति वहाँ पर
आई होती है
सड़कों
पर कलियों की जहाँ
पिटाई होती है।
कुछ ही दिन
में क्रांति वहाँ पर आई
होती है।
गूँगी जनता, अंधी
सत्ता, सूने
गलियारे।
शबनम के
ऊपर फेंके जाते
हों अंगारे।
बहरों
की महफिल में
नहीं सुनाई होती
है।
कुछ ही दिन
में क्रांति वहाँ पर आई होती है।
काम नहीं मिलता जब कर्मशील दो
हाथों को।
भूल- भूल
अपने दीवानों को, फुटपाथों
को।
आजादी
महलों में बैठ
पराई होती है ।
कुछ ही दिन में क्रांति वहाँ पर आई होती
है।
गाली-गोली की
भाषा में होती
हैं बातें ।
पता नहीं चलता आता दिन, कब होती रातें।
सत्ता
की साँपों के
साथ सगाई होती
है ।
कुछ ही दिन
में क्रांति वहाँ पर आई
होती है।
रोज आँसुओं से माता बच्चों को नहलाती।
मानव शिशु को भूख
मौत की माला पहनाती।
कुत्तों
को जब मिलती
दूध मलाई होती
है ।
कुछ ही दिन
में क्रांति वहाँ
पर आई होती है ।
जब
दहेज़- दानव सेजों को
तोड़-तोड़ देता।
पागल पनघट
जब गगरी को
फोड़-फोड़ देता।
दुलहन
की चूड़ी से
दूर कलाई होती
है ।
कुछ ही
दिन में क्रांति वहाँ पर आई
होती है ।
कोठी -कोठों में जब
कुछ भी फर्क
नहीं रहता।
संन्यासी
के पास धर्म का
तर्क नहीं रहता ।
आँखें
नहीं जहाँ पर
लाज लजाई होती
है।
कुछ ही दिन में
क्रांति वहाँ पर आई होती
है।
फसलें जब
जल जाती हों
विष की बरसातों से।
लूटी
जाती हों
दुलहन अपनी बारातों
से ।
कुआँ ‘मनीषी’ इधर- उधर जब खाई होती
है।
कुछ ही
दिन में क्रांति वहाँ पर आई
होती है।
कुछ तोंदों
का बढ़ता जाये
रोज- रोज घेरा ।
ब्याज वतन
के रोम-रोम
पर जब डाले
डेरा ।
रोगी
सारा देश, न
जहाँ दवाई होती
है।
कुछ ही दिन में
क्रांति वहाँ पर आई होती है।
तुलसी, सूर,
कबीरा का तन-मन चीरा
जाता ।
भ्रष्ट गद्य
ही जहाँ शुद्ध कविता हो कहलाता।
गीत,
गजल अपमानित जहाँ
रुबाई होती है।
कुछ ही
दिन में क्रांति वहाँ
पर आई होती है।
- डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
[ काव्य-संकलन 'आग के अक्षर' से ]

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