शहीद की वेदना - डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
शहीद की
वेदना
मैं
शहीद की दुखी
आत्मा आजादी का
कटा पाँव हूँ ।
खण्डित नगर, डगर टूटी- सी, लुटा
-पिटा सा
एक गाँव हूँ ।
फाँसी
के फंदों से
पूछो अपनी कुर्बानी
की बातें।
केवल देश दिखाई देता
दिन हो या फिर काली
रातें ।
भारत
माँ भगवान सरीखी
चन्दन समझी अपनी
माटी।
अखबारों
के बिस्तर ऊपर
हमने भरी जवानी
काटी ।
खेतों
में बन्दूकें बोई
रक्त लिया आजादी
दे दी ।
बटमारों
ने आजादी तो
ले ली
पर बर्बादी दे दी ।
कटी -
फटी आजादी लेंगे
हमने कभी नहीं
सोचा था ।
सपने
में भी दो लाशों
से आधा कफ़न
नहीं नोचा था।
देशभक्त
पीछे बैठे हैं
शिखंडियों ने सत्ता
ले ली।
आज वही माँ
कहलाती जिसने न प्रसव की
पीड़ा झेली।
आँखों
के होते भी
अन्धे कैसे दें
अर्थी को कन्धे।
सूरज तक को डांट रहे हैं, करने वाले काले
धन्धे।
नेताओं
को देख रहे
हम ये समाधियाँ
तोड़ रहे हैं।
इतिहासों
की काली स्याही
से निज नाता
जोड़ रहे हैं।
बोलो
मेरे देशवासियो ! तुमसे
एक प्रश्न करता
हूँ ।
अपने आँचल फैलाओ
तुम अंगारों से
मैं भरता हूँ ।
क्या
कहते हो अंगारों
से सबकी झोली
जल जाएगी?
दीवाली
में दीप न
होंगे दिन में
होली जल जाएगी ।
हम भी तो जल गए देश–हित क्या हम भी इन्सान नहीं थे?
तुम
जैसे ही हाड़-माँस
के हम भी
थे भगवान नहीं थे।
रक्त, शिरा, मज्जा
से निर्मित ममता
के हाथों पाले थे ।
हल से
या फिर बन्दूकों
से हाथों में
पड़ते छाले थे ।
अच्छा
फूल तुम्हें देता हूँ अंगारों को
मैं लेता हूँ ।
मैं
हूँ तुच्छ शहीद
देश का भारत
का मैं कब नेता हूँ।
रोया
हूँ दो बार
सिर्फ मैं बाकी
मेरी आँख न रोई ।
जिस दिन
टूटी थी
समाधि या जब भारत
माँ भूखी सोई।
इसीलिए क्या फाँसी
खाई मेरी बहन
भूख झेलेगी।
खिलने
से पहले कलियों
को आँधी गोदी
में ले लेगी।
परिवारों की चिन्ता लेकर
फाँसी कौन यहाँ
खायेगा?
हाथों
में अपना सिर
लेकर आगे कौन
यहाँ आएगा?
पूछो
उस माता से जाकर जिसका
लाल हुआ था बाग़ी।
जानो
जाकर पीर पिता
की, इकलौता बेटा
बैरागी।
बेवा
के सूने हाथों
ने बेटे को
यों कह पुचकारा ।
मत रो बेटे
आजादी लाने निकला
है पिता तुम्हारा ।
आजादी आ गई
मगर वह महलों
में ही बंद
हो गई।
कुटिया
के चेहरे की
झुर्री भ्रष्ट गीत
का छंद हो गई ।
बेटा बोला
माँ से माता नहीं
पिता जी अब तक आये।
आजादी
लाने निकले थे, कैसे माँ
उसको समझाये।
आजादी मिल
गई लाडले मावस पूरनमासी
हो गई।
अपने घर से
दूर गुलामी जैसे
इक संन्यासी हो गई।
आजादी
की ताजा माला
अब तो काफी बासी
हो गई।
दिल को पत्थर
करके सुन
ले तेरे बाप को
फाँसी हो गई।
कितने
बेटे और भतीजे
देख रहे हैं
आस लगाये।
बहन,
भानजे सोच रहे
हैं शायद आजादी
घर आये।
आजादी
का अर्थ हुआ
है भारत में
बस आधी रोटी।
बात झोपड़ी
की करनी क्या जिसके पास न
फटी लँगोटी।
जो आजादी रोटी
तक भी दे न
सके अपने लालों को।
सचमुच
वह आमंत्रण देती
है बर्बादी के
व्यालों को।
कैसे
धन्ना सेठ कहेंगे,
हम युग – युग के
कंगालों को।
कोई कब तक छुपा
सकेगा अपने पैरों
के छालों को।
कपड़ों की केंचुली
फाड़कर सारे दाग
उभर आयेंगे ।
पतझड़
के झोंके से बासी पत्ते
सभी बिखर
जायेंगे ।
राजनीति के चित्र बदलते,
जैसे राह बदलता
राही ।
या पश्चिम की मेम बदलती प्रेमी, पति ब्याही-
अनब्याही।
हिंसा और अहिंसा
वाली डोर न
फिर काफी तन जाये।
मुझको डर है भूखी पीढ़ी नाथूराम न
फिर बन जाये ।
समय शेष है सोचो,
समझो वरना शामत आ
जायेगी।
भूख देश की रोटी
क्या है
संसद को भी
खा जायेगी।
कलश खिलखिलाते हैं ऐसे
जैसे
किला फतह कर डाला।
अगर नींव
विद्रोह करे
तो पिट
जायेगा तुरत दिवाला ।
रक्त
शहीदों की
कुर्बानी वाला व्यर्थ नहीं जाता है।
देर - सवेर
भले हो चाहे
आखिर रक्त
रंग लाता है
।
लेकिन रक्त - रक्त कब समझा
तुमने
समझा केवल पानी।
कुर्बानी को
समझा तुमने केवल किस्से और कहानी।
आते पास चुनाव चक्र
तो याद शहीदों की है आती।
चतुर लोमड़ी और भेड़ियों
की टोली है अश्रु
बहाती।
नाटक रचा – रचा आकर्षक
जनता को है
मूर्ख बनाती ।
नाम हमारा ले -लेकर
वह कितने तोरण
द्वार सजाती ।
जीते पीछे पाँच
साल तक उनको
याद न हम आते हैं।
उन लोगों
को नाम शहीदों के फिर
तनिक नहीं भाते हैं।
अपना भी परिवार
रहा है
माता – पिता बहन औ’ भाई।
आज कहाँ वह,क्या करता है इसकी किसको कब सुधि आई।
भूखा, ज़िन्दा या मरता है
उसकी खबर कभी क्या ली है।
तुमने तो
अपने प्यालों में
केवल मदिरा ही ढाली है ।
मदिरा को
मदिरा मत समझो खून
शहीदों
का पीते हो।
बेच - बेच कर
इज्जत माँ की बार- बार मरकर जीते
हो।
हम भी तुम सम
घर में रहकर काफी मौज
उड़ा सकते थे।
बेड़ी -
हथकड़ियाँ माता की क्या फिर कभी तुड़ा सकते थे?
ऐसा ही सम्मान
मिला तो फिर
से कौन शहादत
देगा।
माली
कौन चमन की
अपने जिम्मे यहाँ
हिफाजत लेगा ।
अपना
दर्द किसे दिखलायें
अपनी पीर किसे
हम बाँटें।
ताम्रपत्र से पेट
नहीं भरता इसको लेकर क्या
चाटें।
देना
है तो प्यार
हमें दो पीछे
की सब चिन्ता
ले लो।
छाती
में गोली खायेंगे
तुम सब सुख
से खाओ खेलो ।
बहरे
कानों को हमने
ही जनता की
आवाज सुनाई।
लेकिन
कुछ लोगों को
केवल चर्खा ही
देता दिखलाई ।
भाषण देने वाले काफी हमको सिर्फ यही
कहना है ।
हम तो चले
गये दुनिया से
तुमको दुनिया में
रहना है ।
जीना
है सम्मान सहित तो
पहले हँसकर मरना
सीखो ।
काँटों
की पगडण्डी
पर से नंगे
पाँव गुजरना सीखो ।
अपना
पेट श्वान भी
भरता तुम औरों का भरना
सीखो ।
कथनी
वाले बहुत मिलेंगे
तुम करनी को करना
सीखो ।
सैनिक
हो या वीर सिपाही
जो माटी के
हित मरता है।
देश हेतु जो मरे
‘मनीषी’ सौ - सौ
अश्वमेध करता है ।
एक मरा
सौ ज़िन्दा
हैं हम जाकर मेरे
घर पर कहना।
दिल को मिले
दिलासा यदि तो होगा बन्द
अश्रु का बहना।
प्यार
करो परिवार से
मेरे तुमको
कोई कष्ट न होगा।
आजादी
का यह मन्दिर फिर
तूफानों से नष्ट
न होगा ।
फिर मेरे
दिल का हर कोना
सुख से गद्
गद हो
जायेगा ।
आजादी
का नन्हा बिरवा
फिर तो बरगद
हो जायेगा।
- डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
[ काव्य-संकलन 'आग के अक्षर' से ]

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