प्रतिज्ञा - डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
प्रतिज्ञा
भारत की पावन
माटी में, शुभ अरावली
की घाटी में।
बन करके बिजली टूट
पड़ा वह अकबर की
चौपाटी में।
वीरों
की लेकर सभी
शक्ति ऋषि-मुनियों की ले पूत भक्ति।
इक
स्वतंत्रता का फूल
खिला उस पराधीन
परिपाटी में।
भारत
को नई जवानी
दी, दरिया
को तेज रवानी
दी।
बलिदानों की दीपावलियाँ लेखक को नई
कहानी दी।
धरती सारा
अम्बर डोला कण-कण हर-हर बम-बम बोला।
वृद्धों
में फिर से
जोश जगा रवि को
निहार तम दूर भगा।
हैं साथ नहीं
भैया तो क्या, डगमग डोले नैना
तो क्या।
जब तक
शोणित की बूँद
एक छोडूँ स्वतंत्रता की न टेक।
सोने- चाँदी
की थाली क्या
हीरे- पन्ने की प्याली
क्या।
जब तक ना
पूर्ण प्रतिज्ञा हो सुविधा
की पूर्ण अवज्ञा हो।
तब तक धरती
पर सोऊँगा स्वातन्त्र्य
बीज मैं बोऊँगा।
पत्तों
पर भोजन कर
लूँगा रूखी- सूखी से
भर लूँगा।
आँखों
में आँसू की क्रीड़ा मुस्काती
आनन पर पीड़ा।
पौरुष
दे छोड़ परुषता
को तब आती है
मुख पर व्रीड़ा।
ईश्वर
ने कठिन परीक्षा
ली निर्दय ने
नहीं प्रतीक्षा की।
भूखे बच्चे
रोने लगते
तब उर में
गोले से दगते।
आँखों में
आँसू आ
बोले बन जाओ
साहस के शोले।
मण्डली ‘मनीषी’ बैठी थी भूखी
आँतें सब ऐंठी थी।
थीं कठिन
परीक्षा की घड़ियाँ
ले आईं पीड़ा की लड़ियाँ।
सेकी
जब घासों की रोटी
नाचा था मन फड़की
बोटी।
बच्चे
किलके इस आशा
से हमको रोटी मिल जाएगी।
पर्वत पर चढ़ने
वाला ज्यों सोचे
चोटी मिल जाएगी ।
नन्हे हाथों
में आई थी
विधि को यह भी न समाई थी।
उसको षट व्यंजन कर पुलाव झट से झपटा जंगली बिलाव।
भूखे बालक चिल्लाये
थे आँखों
में आँसू आए थे।
माता
की ममता रोई थी
राणा का पौरुष
डोला था।
अब भी तुम
क्या सह पाओगे कानों
में कोई बोला था।
ऐसे
जीने से तो
राणा मर जाना ही
अब अच्छा
है।
धिक्कार
पिता पर है
ऐसे मरता भूखा
रो बच्चा है।
भूखे
बच्चों की भूखों
की बिन पानी
मरते रूखों की।
आँगन के खेल-खिलौनों
की नयनों के स्वप्न
सलोनों की।
मस्तक
की उजड़ी रोली
की उस तार-तार
सी चोली की।
ऋषि- मुनियों
की परिपाटी की
भारत की पावन
माटी की।
सौगंध
तुम्हें मेरे प्रताप
अब तुमको
कुछ करना होगा।
अरिमुण्ड
मांगती काली माँ
उसका खप्पर भरना
होगा।
चाहो
यदि जीवित रहना
तो हँसते- हँसते
मरना होगा।
पाना
चाहो यदि कूल
अरे रक्तिम सागर
तरना होगा।
जब सुनी चुनौती
माता की तन
रोम- रोम ललकार उठा।
जैसे
सोये अहि को
छेड़ा वह क्रोधित
हो फुफकार उठा।
असि
नागिन सी लपलपा उठी
सारी धरती कंपकंपा उठी ।
आँखों में खून उतर आया सर्दी
में जून उतर
आया।
चेतक पर चढ़
केहरि गरजा रक्तिम
सावन से तन
सरसा।
तलवारों से
वह अगन
जली ऊपर से
पागल पवन चली ।
धरती की पावन
पुस्तक पर अरि मुण्डों के नव शब्द बना ।
लेखनी
बना करके असि
की इतिहास लिख दिया रक्त सना।
धीरे- धीरे करके सारे दुर्गों पर झण्डे फहराये।
अफसोस
यही चितौड़ देखता
रहा पलक बिन
झपकाये।
वह
देशभक्ति की मस्ती
में बसता स्वतंत्रता
बस्ती में।
मतवाला केहरि झूम
उठा ज्यों शलभ
शिखा को चूम उठा।
वह टूट गया
पर झुका नहीं
मंजिल पाये बिन रुका
नहीं।
वह
भारत माँ की
शान बना औ’ मानव से भगवान बना।
जब
तक अम्बर में तारे
हैं सूरज औ’ चंदा चमकेगा।
तब तक तेरा राणा प्रताप यश-
सूर्य धरा पर
दमकेगा।
- डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
[ काव्य-संकलन 'आग के अक्षर' से ]

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