बीमार वैद्य - डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
बीमार वैद्य
आग हाथ में
लेकर चलने वालों
को कैसे अपने गीतों का नंदन दे दूँ?
रोज झूठ को तिलक लगाने वालों को कैसे अपना निश्छल
सत्यसदन दे दूँ?
मैंने ऐसे कालिदास
भी देखे है ,
बिना पिए दो
छंद नहीं पढ़
सकते हैं।
ऊपर चढ़ने, आगे
बढ़ने को कहते-- ,
लेकिन खुद दो
कदम नहीं बढ़ सकते
हैं।
दिल में
तो आशंका है
गहरी भाई।
माली कहीं न
हो जाये
अब हरजाई ।
अम्बर पर नित सेज सजाने वालों को कैसे अपनी धरती की
दुलहन दे दूँ?
आग हाथ में
लेकर चलने वालों
को कैसे अपने गीतों का नंदन दे दूँ ?
सरस्वती की प्रतिमा
को उसके बेटे ,
नित प्रति मदिरा
से नहलाते रहते
हैं।
राणा साँगा
के वंशज कहलाते
जो ,
अकबर के तलवे
सहलाते रहते हैं ।
बोली लगती है
तन के बाजारों
में ।
झगड़ा होता
है मन के
बटमारों में ।
मैं डरता
हूँ वेश्या बना न डालें वे कैसे
कविता का अक्षत यौवन दे दूँ?
आग हाथ में
लेकर चलने वालों को
कैसे अपने गीतों
का नंदन दे दूँ?
कुर्सी ही आराध्य
हो गई है
जिनकी ,
उनकी नीयत पर मुझको
विश्वास नहीं।
कफ़न बेचने वाले
सभ्य शरीफों को ,
सौपूँगा अपने सपनों की लाश
नहीं ।
आँसू को सड़कों
पर भटकाने वाले,
आशा को
सूली पर लटकाने
वाले।
बूढ़े, खूसट, कामी,लम्पट काँटों को
कैसे भोली कलियों का बचपन दे दूँ?
आग हाथ में
लेकर चलने वालों को कैसे
अपने गीतों का नंदन
दे दूँ ?
ताजमहल की
ऊँची -ऊँची दीवारों ,
के नीचे
शिल्पी- लाशें चिल्लाती हैं।
रेशम के
वस्त्रों के नीचे
घुटी- घुटी ,
अधनंगी भूखी
आवाजें आती हैं ।
सूरज के
हत्यारे कुटिल अँधेरों
को।
चाँद मारने
वाले दुष्ट सवेरों
को।
जिनके हाथ
रँगे संगीन गुनाहों
से कैसे उनके
माथे पर चंदन दे
दूँ?
आग हाथ
में लेकर चलने वालों को
कैसे अपने गीतों का नंदन दे दूँ?
इस धरती
पर जन्मे, पले
यहीं रहते ,
लेकिन गीत
पड़ोसी के जो
गाते हैं ।
धूप, चाँदनी
गैरों की अच्छी
लगती,
अपनी माता
को गाली दे
जाते हैं ।
रौंद रहे
जो ऋषियों की परिपाटी
को।
बेच रहे
हैं जो भारत
की माटी को।
ऐसे दुष्ट, कृतघ्न,‘मनीषी’ मानव को कैसे अपनी श्रद्धा अभिनन्दन दे दूँ?
अम्बर पर नित सेज सजाने वालों को कैसे अपनी धरती की
दुलहन दे दूँ?
- डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
[ काव्य-संकलन 'आग के अक्षर' से ]

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