सबक सिखाना व्यर्थ नहीं - डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
सबक
सिखाना व्यर्थ नहीं
अंगारों
को कली- कली या
फूल बनाना व्यर्थ
नहीं ।
शासन के दुःशासन को अब सबक
सिखाना व्यर्थ नहीं।
बिना तराजू
न्याय जहाँ अन्याय तोलने
लग जाए।
रोज -रोज दर्पण
चेहरों से झूठ बोलने
लग जाए।
मरहम अपना धर्म छोड़कर कातिल -दल
से मिल जाए।
पनघट की कटु गाली
से प्यासों की छाती छिल जाए।
तब पनघट की ईंट
-ईंट से
ईंट बजाना व्यर्थ नहीं।
मरघट
की माटी से
मन्दिर नया सजाना
व्यर्थ नहीं ।
वीर शहीदों को समाधियों का अपमान किया जाए।
पीकर घूँट खून की बोलो कब तक यहाँ जिया जाए।
थोडा – सी अनबन से कुनबा
बारह बाट किया जाए।
सिर की पीड़ा का उपचार
जहाँ सिर काट किया जाए।
रूठी
हुई शान्ति देवी को
पुनः मनाना व्यर्थ नहीं।
शुद्ध क्रांति के स्वर में फिर से गीत सुनाना व्यर्थ
नहीं।
जब आँगन की
तुलसी बेची जाती हो
बाजारों में।
कैदी हो
जाती हो घर की
प्रीत कई दीवारों में।
संध्या और हवन पर जब-
जब धूल गिराई जाती हो।
चोटी और
जनेऊ पर तलवार
चलाई जाती हो ।
तब -तब मेरा
कवि कहता है तीर चलाना व्यर्थ नहीं।
मजहब की दूकानों
में भी आग लगाना व्यर्थ नहीं।
रक्षक रक्षा- कार्य
छोड़ निर्दय भक्षक बन जाता हो।
बगिया का हर फूल क्रूर
कातिल तक्षक बन जाता हो।
गीता, गंगा,
गायत्री, गौ माँ
का गौरव मर जाए।
मन चौखट पर मौन ‘मनीषी’ चिन्ता दीपक धर जाए।
तब चोरों
के घर में घुसकर माल चुराना
व्यर्थ नहीं।
बची
खुची पूँजी को मित्रों ! पुनः
बचाना व्यर्थ नहीं।
- डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
[ काव्य-संकलन 'आग के अक्षर' से ]

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