कुछ भविष्य का ध्यान करो - डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
कुछ
भविष्य का ध्यान
करो
भूतकाल
को रोने वालो।
वर्तमान को
ढोने वालो।
ऐसे कब तक
काम चलेगा कुछ
भविष्य का ध्यान करो।
चाहो देश रह
सके जीवित, अपना
जीवन-दान करो।
बँटवारा
जो करवाया है
प्रकट उसी पर
खेद करो ।
जिस
थाली में खाना
खाते उसमें तो
मत छेद करो ।
अपने
होकर गैरों जैसा
मत निर्दय बर्ताव
करो ।
अपनी
माता की छाती
में नित्य
नये मत घाव
करो ।
समय बड़ा नाजुक
है भैया ।
नचवा देगा
ता-ता- थैया ।
बनकर
कृष्ण कन्हैया फिर
कंसों पर शर-संधान
करो ।
चाहो
देश रह सके
जीवित, अपना जीवन
दान करो ।
औरंगजेब
हुआ फिर जीवित
‘राणा-शिव’ तलाश
करो ।
आस्तीन
के साँपों का
तुम जरा नहीं
विश्वास करो ।
‘राम-कृष्ण’
के बेटो
जागो पानी सर
तक आ पहुँचा।
सोचो
समझो सँभलो अब तो
दुश्मन घर तक आ पहुँचा।
ओ कुर्सी
के ठेकेदारो ।
ओ शरीफ
दिखते बटमारो।
ज्यादा
ही चढ़ जाय
न सिर पर
इतना मत सम्मान
करो।
चाहो
देश रह सके
जीवित, अपना जीवन
दान करो ।
आग
के अक्षर/पृष्ठ ३७
भारत माँ
का कभी खून
से हो सकता
श्रृंगार नहीं ।
घावों को
राहत शीतलता दे
सकते अंगार नहीं।
पेट के लिए
देश बेचकर कोई निशिदिन
हँसता है।
केवल कुर्सी
पूज रहे हैं
ऐसी क्या परवशता
है ।
देश भक्त
लगते गद्दारो ।
अरे स्वस्थ
लगते बीमारो।
धुंध
बढ़ गई है
मजहब की इसका
तुरत निदान करो ।
चाहो
देश रह सके
जीवित, अपना जीवन
दान करो।
तुमको
पाकिस्तान मिल गया
हिन्दुस्तान हमारा है ।
हिन्दुस्तान
हिन्दुओं का है
यही हमारा नारा
है ।
अपना
व्रत है भारत
को फिर ‘हिन्दू
राष्ट्र’ बनायेंगे।
जाने
कितने वीर हकीकत
हँसकर शीश कटायेंगे।
नई चेतना
आ जाएगी।
अन्धकार को
खा जाएगी।
अपने
हित के लिए
‘मनीषी’ नहीं
राष्ट्र कुर्बान करो।
चाहो
देश रह सके
जीवित, अपना जीवन
दान करो।
- डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
[ काव्य-संकलन 'आग के अक्षर' से ]

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