मेरी माटी चन्दन रोली - डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’


           मेरी माटी चन्दन रोली
दुर्गा सा है   रौद्र रूप तो  सीता  सी  है  भोली।
जितना  गर्व करूँ थोड़ा यह माटी चन्दन रोली।
               भौगोलिक स्वरूप इसका तो दुनिया से है न्यारा।
               हर भूले-भटके  माझी को मिलता यहाँ किनारा।
               जियो  और जीने  दो सबको गूँज रहा यह नारा।
              ऋषि -मुनियों की जन्मभूमि है  भारतवर्ष हमारा।
सदा शान्ति-हीरक -मुक्तक से भरती जग की झोली।
जितना   गर्व  करूँ  थोड़ा  यह   माटी चन्दन रोली।
           वीर    प्रसविनी,  क्रान्ति  धर्मिणी, तेजस्वी  है माता।
           ऋतुएँ  नाच   रही स्वागत  में  कण-कण गीता गाता।
           उपमा  कहीं न  मिलती   इसकी  ऐसा  रूप  सुहाता।
           सत्यं, शिवं, सुन्दरम् का संगम कण-कण में पाता।
सदा  मौत से इसके  बेटे  करते  हँसी-ठिठोली।
जितना गर्व करूँ थोड़ा यह  माटी चन्दन रोली।
            सूरज  की  जननी  है  यह  तो   चंदा  इसका  बेटा।
            राणा,  शिवा, भगत, बिस्मिल इसकी गोदी में लेटा।
            पलक  पाँवड़े  बिछा  सदा मित्रों  को  इसने  भेंटा।
            इसकी   बेटी  चंडी  बनती   बाँध  कमर  में  फेंटा।
नन्हा भरत सिंह- शावक से खेले आँख मिचोली।
जितना  गर्व  करूँ  थोड़ा यह माटी  चन्दन  रोली।
             जामुन तले बाँह सिर धरकर  छाँह अहल्या  सोती।
              विरह-नायिका सम रजनी धरती पर शबनम बोती।
              सोने-  चाँदी  की  वर्षा  खेतों  में  नित  ही  होती।
              दिन की दुल्हन बाँधकर चलती धूप-छाँव की धोती।                                                    
शीतल, मंद, सुगन्ध पवन की धारण करती चोली।
जितना  गर्व  करूँ  थोड़ा यह  माटी  चन्दन रोली।
               पंछी  सदा  सृजन का  व्रत  लेकर उड़ता  पांखों में।
               गंगाजल की मिठास कब मिलती  मिश्री  दाखों में।
               कोई   नजर   मिलाये   कैसे  भरा  तेज  आँखों  में।
               जो-जो  इसमें विशेषता  वह  मिले नहीं  लाखों में।
प्रकृति -नायिका सूर्य-रसिक से खेले हँस-हँस होली।
जितना  गर्व  करूँ  थोड़ा  यह   माटी चन्दन  रोली।
              राशि-राशि सौन्दर्य  यहाँ  पर  कितना बिखर  रहा है।
              जितना देखो  ध्यान  लगाकर  यौवन  निखर  रहा है।
              पश्चिम  का   तूफान   पूर्व   में  आकर  उतर  रहा  है।
              डूबा  बेड़ा   दुनिया  का  इस  भू  पर  उभर   रहा  है।
किरण  कहारों  के  कन्धों  पर  इन्द्रधनुष  की डोली।
जितना   गर्व  करूँ  थोड़ा  यह  माटी  चन्दन  रोली।
              खाकर च्यवनप्राश  जर्जर भी  हो  जाता  बलवाला।
              गोरी   चिट्टी   घरवाली   तो   काला   है   घरवाला।
              साला   जीजा   को  कहता   है  तू   है  मेरा  साला।
              भाभी देवर से  हँस  कहती  अमिया  ला  दो लाला।
कड़वा  नीम ‘मनीषी’ बाँटे  मीठी सुघड़ निबोली।
जितना  गर्व  करूँ  थोड़ा  यह  माटी चन्दन रोली।

- डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
 [ काव्य-संकलन 'आग के अक्षर' से ]


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