ओइम् एक पुरवैया - डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
ओइम् एक पुरवैया
ओइम् जपो मेरी
बहना
ओइम् जपो मेरे भैया ।
भवसागर के कठिन सिन्धु का ओइम् जहाज-खिवैया ।
ओइम्
असंभव को संभव
कर देता है ।
क्रन्दन के स्वर
में कलरव भर
देता है ।
पारस है लोहे को
कुन्दन कर देता ।
धूलि कणों को
भी यह चन्दन
कर देता ।
सारा जग पतझड़
समान है ओइम्
एक पुरवैया ।
ओइम् जपो मेरी
बहना ओइम् जपो
मेरे भैया ।
ओइम्
जपे से सारे
बंधन खुल जाते ।
पाप पंक के
कल्मष सारे धुल
जाते ।
ओइम् जपे
से पूरा होता
हर सपना ।
इसीलिए
सब त्याग ओइम् निशिदिन जपता ।
ओइम् जपे से
भरती मन की सूखी ताल- तलैया ।
ओइम् जपो मेरी
बहना ओइम् जपो
मेरे भैया ।
ओइम् बिना
मन-मीन सदा से प्यासी
है ।
ओइम् बिना
हर सुख वैभव
संन्यासी है ।
ओइम् जपे
से हटती दूर
उदासी है ।
ओइम् जपे
हर मावस पूरनमासी
है ।
सकल विश्व बालक छोटा –सा ओइम् पिता औ’मैया ।
ओइम् जपो मेरी
बहना ओइम् जपो
मेरे भैया ।
ओइम् जपे
से मरघट पनघट
हो जाये ।
विष का सागर
भी झट मधुघट
हो जाये ।
बहुत दूर पीड़ा
का जमघट हो
जाये ।
सीधी जीवन की
हर सलवट हो
जाये ।
ओइम् बिना डोलती ‘मनीषी’ डगमग- डगमग नैया ।
ओइम् जपो मेरे
भाई ओइम् जपो
मेरे भैया ।
- डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
[ काव्य-संकलन 'आधा कफन' से ]

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