गीत -मीत - डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’


                                गीत -मीत      

तुम मेरी इस तुच्छ लाश को पावक, कफ़न तनिक मत देना।
पर   मैं अपने  गीत-मीत   का  वंदन  कभी   नहीं  छोडूँगा ।
              
                      फाकों  पर जीवन  काटा  है  शूलों  की  शय्या पर सोया।
                      कितनी शूल चुभोई जग  ने कभी ‘मनीषी अहम् न रोया।
                      तुम अर्जुन बन तीर चलाओ,मैं भी भीष्म पितामह बनकर-
                      अपना  कर्म,  मर्म  जीवन  का चंदन कभी  नहीं छोडूँगा।

कर्म-क्षेत्र  में  डट जाने  की  मैंने आज प्रतिज्ञा कर ली।
फूलों को  ठुकराकर  मैंने खुद काँटों से  झोली भर ली।
आँसू को आराध्य बनाकर, श्रद्धा  प्रेम समर्पित करके –
जिसको  मित्र बनाया पावन बंधन कभी  नहीं छोडूँगा।

                        सिद्धांतों  के ऊपर  मैंने अपनी हर इच्छा  को  वारा ।
                        पापी  बन जाने  से पहले अच्छी समझी है यह कारा।
                        जब  तक मेरे नश्वर  तन  में  एक बूँद भी रक्त  शेष  है।
                        जिससे भाँवर ले  बैठा वह नन्दन  कभी  नहीं छोडूँगा।

आँखों  की  कांवड़ में  आँसू का  गंगाजल लहराता है।
साँसों  की सरगम  पर  पीड़ा रूपी  गीत  उभर आता है।
तुम  मेरे  भावों  को  चाहे  सारी  उमर कुँवारा  रखना ---

पर  पीड़ा  पटरानी का अभिनन्दन  कभी  नहीं छोडूँगा।
-  डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
 [ काव्य-संकलन 'आग के अक्षर' से ]

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