रोती कहीं भलाई - डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
रोती कहीं
भलाई
एक ओर हँस रही बुराई रोती कहीं भलाई ।
किसने
इस धरती पर सुख- दुख
की यह रीति चलाई।
साधों की फसलों
पर पड़ता
भरी दुपहरी पाला।
कानों में
पिघला सीसा जाने
किसने है डाला।
एक तरफ क्रंदन
का जमघट बजी
कहीं शहनाई।
किसने
इस धरती पर
सुख- दुख की यह रीति चलाई।
उधर हँसे वासन्ती
मौसम इधर जमा सन्नाटा।
अमर बेल
बन गई दुराशा
दुविधाओं का चांटा।
कहीं - जलाती कहीं
- बुझाती पगलाई पुरवाई।
किसने
इस धरती पर
सुख- दुख की यह रीति चलाई।
तन के
आगे मन मजबूरन करता
गया समर्पण।
ज्यों-ज्यों शिकन पड़ी
चेहरे पर धुँधलाया मन-दर्पण।
पत्नी
पतिव्रता साँसों की
तन का पति
हरजाई।
एक ओर हँस रही
बुराई रोती कहीं
भलाई।
पाँव थके
नाचते- नाचते लेकिन थका न अँगना।
घाव हो
गये कलाइयों में हँसता
कातिल कँगना।
पायल
की जंजीर जबरदस्ती
किसने पहनाई।
किसने
इस धरती पर सुख- दुख
की यह रीति चलाई।
काला अक्षर
भैंस बराबर फिर भी
पंडित ज्ञानी।
बगुले भगत
सिद्ध बन बैठे
पुजते हैं अज्ञानी ।
महलों
ने मद में
भरकर कुटियों में
आग लगाई ।
किसने इस
धरती पर सुख- दुख
की यह रीति चलाई।
जीभ रखी
गिरवी होठों पर लगा
बड़ा सा ताला।
सारी दाल हुई
है काली कहें
दाल में काला ।
पीकर खून हँसी मन
ही मन चाँदी की
अमराई ।
किसने
इस धरती पर सुख-दुख की यह रीति चलाई ।
खेल रही हैं चौसर साँसें
पौ- बारा
पच्चीसी।
यहाँ ज़िन्दगी भार
ज़िन्दगी पर ढो रहे ‘मनीषी’।
कहीं
साँस लेती अँगड़ाई कहीं
आस लंगडाई ।
एक ओर हँस
रही बुराई रोती
कहीं भलाई ।
- डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
[ काव्य-संकलन 'आग के अक्षर' से ]

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