रात हुई है दिन सी - डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
रात हुई है
दिन सी
पायल
में संगीत नहीं
लिपटी पग में
नागिन सी ।
पीड़ा
लगे ज़िन्दगी की
पक्की सच्ची साथिन
सी ।
परिवर्तन हो गया
कि इतना सब
पहचानें भूली ।
चन्दन होकर धूल शीश
पर चढ़ती है अब धूली।
दिन हो गया
रात जैसा तो
रात हुई है
दिन सी ।
पायल में संगीत
नहीं लिपटी पग
में नागिन सी ।
पैसे देकर टिकट
कटा लो लगी
स्वर्ग में सीढ़ी।
दौड़ प्रगति की
बिन पैरों ही दौड़
रही नव पीढ़ी।
पुरवाई
कर रही शरारत गाड़े
तन में पिन सी।
पायल
में संगीत नहीं लिपटी पग
में नागिन सी।
आदर्शों की द्रुपदसुता हो गई समूची
नंगी।
मजहब की रातें
जवान हैं छल
है उसका संगी।
सच्चाई
की सीता भटके
दर- दर बंजारिन सी।
पायल
में संगीत नहीं
लिपटी पग में नागिन सी।
चार्वाकी औ’ दास
मलूका हुए आज फिर ज़िन्दा।
कटे धर्म के पंख
गगन से गिरता
दुखी परिन्दा।
दया, क्षमा,शीलता, सादगी दुखिया वनवासिन सी।
पायल
में संगीत नहीं
लिपटी पग में नागिन सी।
सूरज को
डाँटते, ‘मनीषी’ अब मुँहजोर अँधेरे ।
षड़यंत्रों में
मिले हुए हैं
उनके साथ सवेरे ।
किरणें
बेवा सी उदास
हैं लगती वैरागिन
सी ।
पायल
में संगीत नहीं
लिपटी पग में नागिन सी।
- डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
[ काव्य-संकलन 'आग के अक्षर' से ]

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