पाप -पुण्य - डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
पाप -पुण्य
आँसू
जितनी दूर आँख से
।
उड़ना जितनी
दूर पाँख से ।
है वरदान दूर
जितना अभिशाप से।
उतनी दूर पुण्य
रहता है पाप
से।
जितनी दूर
धूप से छाया।
जितनी दूर
ब्रह्म से माया।
जितनी दूर हँसी है रुदन विलाप से।
उतनी दूर
पुण्य रहता है
पाप से।
जितनी दूर
नयन से लज्जा।
दूर सादगी
से ज्यों सज्जा ।
जितनी दूर देह
रहती है ताप से
।
उतनी दूर पुण्य
रहता है पाप
से।
जितनी दूर
हाथ से कँगना ।
जितनी दूर
नृत्य से अँगना।
जितनी दूर हाथ
ढ़ोलक की थाप से।
उतनी दूर
पुण्य रहता है
पाप से।
जितनी दूर नदी
से सागर ।
पनघट से
पनिहारिन, गागर ।
जितनी दूर गर्म
पानी है भाप
से ।
उतनी दूर पुण्य
रहता है पाप
से।
मन से तन
की जितनी दूरी।
दूर स्वेद
से ज्यों मजबूरी ।
माला जितनी
दूर रही है जाप
से ।
उतनी दूर पुण्य
रहता है पाप
से ।
दिल
से जितनी दूर
मीत है ।
लब से
जितना दूर गीत
है ।
जितनी दूर विवाहित
बेटी बाप से ।
उतनी दूर
पुण्य रहता है पाप से
।
दूर सत्य
से ज्यों पाखण्डी
।
आदर से
ज्यों दूर घमण्डी ।
माथा जितनी दूर तिलक से छाप
से ।
उतनी दूर पुण्य
रहता है पाप
से ।
हृदय प्यार
का रहता भूखा ।
खा लेता
है रूखा - सूखा ।
जितनी दूर
नेह रहता ‘तुम’ ‘आप’ से।
उतनी दूर
पुण्य रहता है
पाप से ।
जितनी दूर त्रिभुज
से आयत।
दूर निकट
संतति से मायत ।
जितनी दूर
कोण रहता है चाप से।
उतनी दूर
पुण्य रहता है
पाप से ।
जितनी दूर सत्य
से धंधा ।
अर्थी
से अपना ही
कन्धा ।
जितनी दूर कफ़न
रहता है नाप से
।
उतनी दूर
पुण्य रहता है
पाप से ।
जितनी दूर चैन
से घायल ।
हँसती ज्यों
पीड़ा की पायल।
अश्व ‘मनीषी’ जितना अपनी टाप
से ।
उतनी दूर पुण्य
रहता है पाप
से ।
- डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
[ काव्य-संकलन 'आग के अक्षर' से ]

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