बन्दा वैरागी हो जायेगा - डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
बन्दा
वैरागी हो जायेगा
जिन्दगी बहार है बहार उसको
रहने दो,
वरना
दिल कलियों का
बाग़ी हो जायेगा।
सीता
को सीता ही
रहने दो,
रहने दो ,
वरना
हर आँचल फिर
दागी हो जायेगा।
पतझड़ को
जाने दो, सावन को
आने दो।
भूखों
को रोटी दो
तृप्ति- गीत गाने दो !
फूलों को
फाँसी पे लटकाओ
मत लोगो।
वरना हर
काँटा बड़भागी हो
जायेगा ।
विष को मत
घुलने दो गंगा
के पानी में,
आँधी को बगिया
में बिलकुल मत ठहराओ।
दशरथ
की भूलें मत बार-
बार दोहराओ।
हर इक रघुवंशी
गृह त्यागी हो
जायेगा ।
शबनम के गालों पर चांटे
क्यों मार रहे।
शोलों के
होठों को चुम्बन
क्यों देते हो?
संस्कृति की रामायण खून
से न सनने
दो,
वरना हर शूल
यहाँ फागी हो
जायेगा।
कविता में
छंदों का अनुशासन रहने
दो,
अनुशासन
टूटा तो दु:शासन आएगा ।
कविता की
द्रोपदियाँ नंगी हो
जाएगी।
हर ऐरा –
गैरा कवि
-रागी हो जायेगा।
बदल
-बदल वेष
यहाँ लोग बहुत
आते हैं,
चौकन्ना
रहने का
मौसम फिर आया
है।
संकेती साड़ी
मत सड़कों पर लहराओ
,
झूठ -मूठ
भँवरा अनुरागी हो
जायेगा ।
तुमने
यह सोचा है
धर्म को खरीदेंगे ,
अपना यह
निर्णय है धर्म नहीं बेचेंगे
।
तैमूरों
के बेटो ! धर्म निज
बचाने को,
हर
हिन्दू बन्दा वैरागी
हो जायेगा ।
- डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
[ काव्य-संकलन 'आग के अक्षर' से ]

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