शब्दों की डोली - डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
शब्दों की डोली
भावों
की दुलहन बैठा, ले चला
शब्द को डोली
में ।
राह उमर की
कटती जाती उससे
हँसी- ठिठोली में।
मैंने सैर कराई उसको धरती
अम्बर सागर की।
राणा, बोस,
शिवा की धरती
औ’ गोपी नटनागर
की।
मृदुल कल्पना की
पाँखों से।
नूतन
दृष्टि दिव्य आँखों से।
दीवाली
दिल्ली की देखी,
ब्रजमंडल की होली में ।
बोली
हम बस जायें
आओ इस गरीब
की खोली में ।
उपमा, अलंकार की
साड़ी नई -नई नित
पहनाई ।
शब्द चित्र
औ’ छंद
सजीले, बजी शिल्प
की शहनाई।
नव्य प्रतीक, बिम्ब के गहने।
मैंने खुश हो
करके पहने।
नव
सुहाग पाया है
लेकिन इस माटी
की रोली में।
देखो
कितनी सुन्दर लगती
तार -तार सी चोली में ।
अब तक हमने
दूध पिया है नित
चाँदी की प्याली में।
भाँति -भाँति के
व्यंजन खाये हैं
सोने की थाली
में ।
आओ अब कुछ स्वाद बदल लें।
बना धरौंदे खूब
मचल लें ।
मज़ा
बड़ा आता साथी
देहाती तुतली बोली
में ।
अरे
काँच की नहीं
ठेठ मिट्टी की
अनगढ़ गोली में ।
मेरा दम घुटने
लगता है महल -अटारी – बँगलों में ।
आओ
साजन जरा खेल
लें इन अधनंगे
कँगलों में।
मेरा रूप
यहाँ निखरेगा ।
दर्दीला सावन
बिखरेगा।
तनिक ‘ मनीषी’ हँस लें रो लें
भिखमंगों की टोली
में।
इनको
सारी खुशियाँ बाँटें
पीड़ा भर लें
झोली में ।
- डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
[ काव्य-संकलन 'आग के अक्षर' से ]

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