तब ही आजादी आई थी - डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
- डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
तब ही आजादी
आई थी
लाखों
दीवानों ने गर्दन
कटवाई थी।
सच कहता
हूँ तब
ही आजादी आई थी।
सबसे पहले दयानंद
ही ललकारा था।
अट्ठारह सौ
सत्तावन का हरकारा
था ।
रजवाड़ों को घर-घर जाकर फटकारा था।
अंगरेजी शासन को
उसने दुत्कारा था ।
सबसे
पहले ऋषि ने पावक
सुलगाई थी।
सच कहता
हूँ तब ही
आजादी आई थी।
परवाने प्रज्वलित शिखा
को चूम गए थे।
कितने पागल बिना पिए ही
झूम गए थे।
भगतसिंह की भक्ति बिना यह हवन न होता।
आशाओं की लाशें
होतीं कफ़न न होता।
कली- कली
निर्दय माली पर
गुर्राई थी।
सच कहता हूँ तब
ही आजादी आई थी।
कितनी राखी रोई औ’ दर्पण टूटे
थे ।
अनगिन गागर से
उनके पनघट लूटे थे।
कितने नन्दन
सूख -सूख शमशान हुए थे।
तब जाकर अपने
पूरे अरमान हुए थे
।
सिसकी
में बदली जब
अपनी शहनाई थी।
सच कहता हूँ तब
ही आजादी
आई थी ।
‘लालाजी’
का लाठी खाना कब भूला है।
गर्म लहू पीकर यह चमन फला- फूला है।
श्रद्धानंद का छाती
तान खड़े हो
जाना ।
याद सभी
को है अब तक वह दृश्य सुहाना।
गुरखों
की संगीन उसी
ने झुकवाई थी।
सच कहता हूँ
तब ही आजादी
आई थी।
मत समझो आजादी
‘गाँधी’ ही लाया
था।
‘बिस्मिल’ ने
भी इसकी खातिर
रक्त दिया था।
‘बंगाली बाबू’
का भी बलिदान
न कम था।
कितने अशफाकों
ने इसमें वक्त दिया
था ।
कितनी माँग
बिना रोली ही
मुस्काई थी।
सच कहता हूँ तब
ही आजादी आई थी।
पढ़-पढ़कर ‘सत्यार्थ
प्रकाश’ सभी
नाचे थे ।
खुश हो -होकर
मृत्यु-पत्र खुद ही
बाँचे थे।
‘श्याम कृष्ण
वर्मा’ ‘सावरकर’ भी क्या कम थे।
‘दुर्गा भाभी’ ‘शेखर’ के क्या
गजब कदम थे।
दर- दीवार
इन्कलाबों से थर्राई
थी।
सच कहता तब ही आजादी आई थी।
आजादी को भीख न समझो कीमत
दी है।
देकर अपना
लाल लहू यह रंगत
दी है ।
आज तिरंगा
गीले नयन निहार
रहा है ।
देश भक्त वीरों
को पुनः पुकार
रहा है ।
हर दीपक ने
ज्योति दयानंद से पाई
थी।
सच कहता
हूँ तब
ही आजादी आई थी।
[ काव्य-संकलन 'आग के अक्षर' से ]

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