मेधाविनं कुरु - डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
मेधाविनं कुरु
हँसवाहिनी ज्ञानदायिनी तम को दूर करो माँ ।
ज्ञान –ज्योति दो जला
हृदय में सब अज्ञान हरो माँ ।
माँ तेरा
सुत अंधकार में यों ही भटक
रहा है ।
झंझाओं की आं
धी में दीपक
सा खटक
रहा है ।
मुक्तिदायिनी वरप्रदायिनी
काव्य–प्रकाश भरो
माँ ।
ज्ञान –ज्योति दो जला
हृदय में सब अज्ञान हरो माँ ।
खाई
इधर उधर देखूं तो गहरा अंध कुआँ है ।
शोषण, द्वेष, कामकुंठा
का फैला कुटिल धुआँ है ।
ममता समता क्षमता का इस जग में दीप धरो
माँ ।
ज्ञान –ज्योति दो जला हृदय में सब
अज्ञान हरो माँ ।
विचर रहा हूँ काव्य-विजन मे बढ़कर राह दिख दो ।
स्वर साम्राज्ञी!इस बालक को स्वर संधान सिखा दो।
वीणापाणी औ’
कल्याणी जन को जनि बिसरो माँ ।
ज्ञान –ज्योति दो जला
हृदय में सब अज्ञान हरो माँ ।
सदा–सदा के लिए शीश, आशीश-हाथ तव
चाहूं ।
धन सम्पदा न मांगूं तुमसे काव्य
नित्य नव चाहूं ।
मेरे पथ में नव
प्रकाश की रश्मि बनो बिखरो
माँ ।
ज्ञान –ज्योति दो जला
हृदय में सब अज्ञान हरो माँ ।
सूरदास से ज्ञान–चक्षु तुलसी सी अचल भक्ति दो ।
कालिदास औ’वाल्मीकि सी
मुझको काव्य शक्ति दो।
दूर न करना मनन
‘मनीषी’ मन में नित
विहरो माँ ।
ज्ञान –ज्योति दो
जला हृदय में सब अज्ञान हरो माँ ।
- डॉ. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’
[ काव्य-संकलन 'आधा कफन' से ]

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